अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण संघर्ष अब पश्चिम एशिया के उन देशों को भी अपनी चपेट में लेता दिखाई दे रहा है, जो अब तक दोनों पक्षों के बीच बातचीत का रास्ता तैयार करने की कोशिश कर रहे थे। कतर, ओमान और पाकिस्तान ने लंबे समय तक तनाव कम करने और संवाद बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन मौजूदा हालात ने उनकी स्थिति बदल दी है। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं को और गंभीर कर दिया है। कतर हमलों को लेकर नाराजगी जता रहा है, जबकि पाकिस्तान सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर बढ़ते दबाव का सामना कर रहा है। दूसरी ओर, ओमान भी क्षेत्रीय तनाव और समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंतित है।
सऊदी की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव
खाड़ी देशों में कतर की स्थिति हमेशा से बेहद खास रही है। एक ओर वहां अमेरिका का महत्वपूर्ण अल-उदीद एयर बेस मौजूद है, तो दूसरी ओर दोहा ने ईरान के साथ भी संवाद के रास्ते खुले रखे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने पर कतर कई बार मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। हालांकि, मौजूदा संघर्ष में ईरानी हमलों के कतर तक पहुंचने से दोनों देशों के संबंधों में नई तल्खी पैदा हुई है। तेहरान का कहना है कि उसके निशाने पर अमेरिकी सैन्य ठिकाने और हित हैं, लेकिन कतर इन हमलों को अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे के रूप में देख रहा है। क्षेत्र में हालिया ईरानी हमलों ने कई खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ाई हैं।
इस पूरे संघर्ष ने पाकिस्तान को भी मुश्किल रणनीतिक स्थिति में पहुंचा दिया है। इस्लामाबाद ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद उसके सामने नई चुनौती खड़ी हो गई। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच गहरे रक्षा और सुरक्षा संबंध हैं, इसलिए क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ने की स्थिति में इस्लामाबाद के लिए पूरी तरह तटस्थ बने रहना मुश्किल हो सकता है। पाकिस्तानी नेतृत्व सऊदी सुरक्षा को अपने लिए महत्वपूर्ण बता चुका है और साथ ही सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील भी कर रहा है।
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सैन्य दबाव की रणनीति कहीं ईरान पर ही न पड़ जाए भारी
ईरान की मौजूदा रणनीति के पीछे अपने विरोधियों पर व्यापक क्षेत्रीय दबाव बनाने की कोशिश दिखाई देती है। तेहरान यह संदेश देना चाहता है कि उसके खिलाफ होने वाली सैन्य कार्रवाई का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य हित भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ता तनाव भी इसी रणनीतिक टकराव का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। हालांकि, यह नीति ईरान के लिए उलटी भी पड़ सकती है। यदि कतर, ओमान और दूसरे खाड़ी देश ईरानी कार्रवाइयों से अपनी सुरक्षा को खतरे में महसूस करते हैं, तो वे अमेरिका के साथ सैन्य और सुरक्षा सहयोग को और मजबूत कर सकते हैं। ऐसे हालात में ईरान जिस दबाव के जरिए अपने विरोधियों को पीछे हटाना चाहता है, वही नीति उसके खिलाफ एक अधिक मजबूत क्षेत्रीय मोर्चा तैयार कर सकती है।
मौजूदा परिस्थितियों में ईरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अमेरिका के सैन्य हमलों का सामना करना नहीं, बल्कि अपने कूटनीतिक संपर्कों को बचाए रखना भी है। रणनीतिक मामलों के जानकारों के बीच इस बात पर अलग-अलग राय है कि तेहरान की नीति प्रभावी प्रतिरोध की रणनीति है या फिर एक ऐसा जोखिम, जो भविष्य में उसके लिए भारी पड़ सकता है। कतर जैसे मध्यस्थ देश के साथ बढ़ती दूरी, सऊदी अरब को लेकर पाकिस्तान पर बढ़ता दबाव और ओमान के आसपास समुद्री सुरक्षा से जुड़ी घटनाएं ईरान के लिए बातचीत के उपलब्ध रास्तों को सीमित कर सकती हैं। अमेरिका के साथ संघर्ष जितना व्यापक होगा, तेहरान को संकट से बाहर निकलने के लिए उतनी ही मजबूत मध्यस्थता की जरूरत पड़ सकती है।
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