विश्लेषकों ने जहाज़ों के जीपीएस डेटा में गंभीर गड़बड़ी देखी। उन्होंने समझा कि किसी ने जानबूझकर नेविगेशन सिस्टम प्रभावित किया। विशेषज्ञ इस समस्या को जीपीएस जैमिंग के नाम से पहचानते हैं। हमलावर तेज रेडियो सिग्नल भेजकर असली जीपीएस सिग्नल दबा देते। इससे जहाज़, विमान, ड्रोन और मोबाइल गलत लोकेशन दिखाने लगते। सेनाएं युद्ध के दौरान दुश्मन को भ्रमित करने के लिए तकनीक अपनातीं। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध अब आधुनिक संघर्षों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका।
पिछले वर्षों में यूरोप के कई विमान भी जैमिंग का शिकार बने। यूक्रेन युद्ध के दौरान सैनिक रोज़ाना ऐसे इलेक्ट्रॉनिक हमले देख रहे। अब मध्य पूर्व के बढ़ते तनाव में यह समस्या तेजी से फैल रही। विशेषज्ञों ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों की नेविगेशन समस्या देखी। जीपीएस जैमिंग जहाज़ों के ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को प्रभावित करती। इस सिस्टम से जहाज़ एक दूसरे की लोकेशन पहचानते हैं। गलत जानकारी मिलने पर समुद्र में टक्कर का जोखिम काफी बढ़ जाता।
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समुद्र में जहाज़ों की टक्कर का खतरा बढ़ा
विश्लेषकों ने संदेह जताया कि इस क्षेत्र में ईरान जैमिंग कर रहा। ईरान ने पहले भी जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों को धमकी दी। कुछ विशेषज्ञों ने रूस और चीन से तकनीकी सहयोग मिलने की आशंका जताई। दूसरी ओर अमेरिकी सेना भी सुरक्षा के लिए जैमिंग सिस्टम इस्तेमाल करती। ड्रोन और गाइडेड हथियारों से बचाव के लिए यह तकनीक उपयोगी होती। टेक विशेषज्ञों ने सैटेलाइट और राडार डेटा से जैमिंग संकेत खोजे। विश्लेषण में उन्हें क्षेत्र में मजबूत इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप के प्रमाण मिले।
वैज्ञानिक अब जीपीएस जैमिंग से बचने के नए उपाय विकसित कर रहे। कुछ कंपनियां एंटी जैम एंटीना सिस्टम बनाकर वाहनों में लगा रही। ये सिस्टम कई फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल कर सिग्नल बाधा से बचाव करते। दूसरे वैज्ञानिक सेंसर आधारित नेविगेशन तकनीक भी विकसित कर रहे। ये तकनीक जाइरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर से वाहन की स्थिति पहचानती। विशेषज्ञ मानते हैं भविष्य में सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड नेविगेशन जरूरी होगा। वे कहते हैं खुले जीपीएस सिग्नल पर निर्भरता अब जोखिम भरी लगती।


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