नेपाल: रेचेप तैय्यप अर्दोआन मार्च 2003 में इस्तांबुल के मेयर रहने के बाद 49 साल की उम्र में तुर्की के प्रधानमंत्री बने थे। इसके मुकाबले काठमांडू के मेयर बालेन शाह सिर्फ 35 साल की उम्र में नेपाल के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। नेपाल में जेन ज़ी से प्रेरित एक नई राजनीतिक लहर ने संसद को काफी युवा बना दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड को छोड़कर ज्यादातर पुराने नेता संसद से बाहर हो सकते हैं। यह बदलाव नेपाल की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत देता है।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी), जो केवल तीन साल पहले बनी थी, बालेन शाह के नेतृत्व में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभर रही है। 275 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए 138 सीटों की जरूरत होती है, जबकि आरएसपी के 180 से ज्यादा सीटें जीतने की संभावना जताई जा रही है। 2008 में राजशाही खत्म होने के बाद से अब तक कोई भी पार्टी अपने दम पर सरकार नहीं बना सकी थी। विश्लेषकों का मानना है कि आरएसपी की संभावित जीत इस धारणा को तोड़ती है कि नेपाल की चुनावी व्यवस्था में किसी एक पार्टी के लिए बहुमत हासिल करना मुश्किल है।
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नेपाल में बालेन शाह के उभार से भारत-नेपाल संबंधों पर नई चर्चा
अगर बालेन शाह प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह पहली बार होगा जब मधेसी मूल का कोई नेता नेपाल की सरकार का नेतृत्व करेगा। हालांकि उनके नेतृत्व से क्षेत्रीय कूटनीति, खासकर भारत के साथ संबंधों को लेकर कुछ अनिश्चितताएं भी सामने आती हैं। भारत को अब तक नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों और नेपाली कांग्रेस के साथ काम करने का अनुभव रहा है, लेकिन आरएसपी के साथ नहीं। चुनाव परिणामों के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरएसपी नेता रवि लामिछाने और बालेन शाह को फोन कर बधाई दी और दोनों देशों के मजबूत रिश्तों की उम्मीद जताई।
हालांकि बालेन शाह के कुछ पुराने फैसलों ने भारत में चर्चा भी पैदा की है। काठमांडू के मेयर रहते हुए उन्होंने हिंदी फिल्म ‘आदिपुरुष’ पर प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि उसमें देवी सीता को भारत की बताया गया था। इसके अलावा उन्होंने नेपाल द्वारा जारी उस नक्शे को भी अपने दफ्तर में लगाया था जिसमें भारत के उत्तराखंड के कुछ हिस्सों को नेपाल का बताया गया था। इन कदमों के कारण यह सवाल उठने लगे कि अगर वह प्रधानमंत्री बनते हैं तो दोनों देशों के संबंध कितने सहज रहेंगे।
बालेन शाह ने अपने चुनावी घोषणापत्र से नेपाल-चीन फ्रेंडशिप इंडस्ट्रियल पार्क परियोजना को भी हटा दिया था। यह परियोजना चीन की बेल्ट एंड रोड पहल से जुड़ी थी और भारत-नेपाल सीमा के पास सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब प्रस्तावित थी। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस परियोजना को लेकर भारत की भी रणनीतिक चिंताएं थीं। ऐसे में इस योजना से दूरी बनाकर शाह शायद भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
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