अमेरिका ने भारत के उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लागू कर दिया है। इसमें 25% शुल्क व्यापार घाटे के कारण और बाकी 25% रूस से तेल खरीदने पर जुर्माने के तौर पर लगाया गया है। इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद अब महंगे हो गए हैं। भारत ने आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन रूस से कारोबार के बहाने उसे निशाना बना रहा है। बी4यूक्रेन और कीव स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि विदेशी कंपनियों ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को 60 अरब डॉलर टैक्स दिया है। यह 2025 के सैन्य बजट का लगभग आधा हिस्सा है। अकेले 2024 में 20 अरब डॉलर का टैक्स रूस के खजाने में गया है। इनमें अमेरिका, जापान और फ्रांस की कंपनियां सबसे आगे रही हैं।
अमेरिकी कंपनियां भी रूस को टैक्स दे रही हैं
सिर्फ 2023 में अमेरिकी कंपनियों ने रूस को 1.2 अरब डॉलर टैक्स चुकाया। फिलिप मॉरिस, पेप्सिको, मार्स, प्रॉक्टर एंड गैंबल और मोडेलेज जैसी 328 अमेरिकी कंपनियां अब भी टैक्स दे रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और यूरोपीय संघ की कंपनियों ने 2023 में रूस को कुल 3.5 अरब डॉलर टैक्स दिया।रूस एक सैनिक को सालाना 18,400 डॉलर कॉन्ट्रैक्ट देता है। 2024 में मिले 20 अरब डॉलर टैक्स से 10 लाख सैनिकों की तनख्वाह दी जा सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि जी7 देशों की कंपनियों का टैक्स सीधे पुतिन की युद्ध मशीनरी को मजबूती देता है।
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए अतिरिक्त टैरिफ लागू किया है। दूसरी तरफ उसके प्रतिनिधि रूस के साथ ऊर्जा सौदों पर बातचीत में शामिल रहे हैं। अमेरिकी कंपनी एक्सॉन मोबिल कॉरपोरेशन रूस से ऊर्जा खरीद समझौते के संपर्क में रही है। इससे अमेरिकी नीति की दोहरी स्थिति उजागर हो रही है।
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