भारतीय क्रिकेट के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों में शामिल अजिंक्य रहाणे ने इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास का ऐलान कर दिया है। गुरुवार को उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भावुक वीडियो और पोस्ट साझा कर अपने फैसले की जानकारी दी। 38 वर्षीय रहाणे ने अपने करियर में कई यादगार पारियां खेलीं, लेकिन 2020-21 की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी कप्तानी हमेशा भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सुनहरे अध्यायों में गिनी जाएगी। उस दौरे पर उन्होंने न सिर्फ टीम को मुश्किल हालात से बाहर निकाला, बल्कि भारत को ऐसी ऐतिहासिक सीरीज जीत दिलाई जिसे आज भी सबसे महान कमबैक में शुमार किया जाता है।
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36 रन पर ऑलआउट के बाद बदला टीम का माहौल
एडिलेड टेस्ट में भारत दूसरी पारी में सिर्फ 36 रन पर सिमट गया था, जो टेस्ट क्रिकेट में उसका सबसे कम स्कोर है। इसके बाद कप्तान विराट कोहली पैटरनिटी लीव पर भारत लौट गए, जबकि रोहित शर्मा हैमस्ट्रिंग चोट के कारण शुरुआती दो टेस्ट नहीं खेल सके। ऐसे कठिन दौर में टीम की कमान अजिंक्य रहाणे के हाथों में आई। कप्तानी संभालते ही उन्होंने ड्रेसिंग रूम में साफ संदेश दिया कि 36 रन पर ऑलआउट की चर्चा अब दोबारा नहीं होगी।
रहाणे की कप्तानी में भारत ने मेलबर्न बॉक्सिंग डे टेस्ट में शानदार वापसी की। उन्होंने खुद 112 रन की कप्तानी पारी खेली और भारत ने मुकाबला जीतकर सीरीज 1-1 से बराबर कर दी। इसके बाद सिडनी टेस्ट में चेतेश्वर पुजारा की धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी और चोटिल होने के बावजूद रविचंद्रन अश्विन की जुझारू पारी ने भारत को हार से बचा लिया। सीरीज का अंतिम मुकाबला ब्रिस्बेन के गाबा मैदान पर खेला गया, जहां ऑस्ट्रेलिया 32 वर्षों से टेस्ट नहीं हारा था।
रोहित, पुजारा और अश्विन ने निभाई अहम भूमिका
रहाणे ने बाद में स्वीकार किया कि कप्तानी के दौरान उन्हें सबसे ज्यादा सहयोग रोहित शर्मा, चेतेश्वर पुजारा और रविचंद्रन अश्विन से मिला। रोहित शुरुआती दो टेस्ट मिस करने के बाद टीम में लौटे और नेतृत्व की जिम्मेदारी साझा की। पुजारा की धीमी बल्लेबाजी पर सवाल उठ रहे थे, लेकिन रहाणे ने उनका पूरा समर्थन किया और अपने स्वाभाविक खेल पर टिके रहने की सलाह दी। दूसरी ओर अश्विन को बल्लेबाजी की चिंता छोड़कर गेंदबाजी पर ध्यान देने की सलाह दी, जिसका असर उनके प्रदर्शन में साफ दिखाई दिया।
ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान मोहम्मद शमी, जसप्रीत बुमराह, रवींद्र जडेजा और हनुमा विहारी समेत कई खिलाड़ी चोटिल हो गए थे। इसके बावजूद रहाणे ने युवा खिलाड़ियों को खुलकर खेलने और बिना किसी दबाव के मुकाबला करने का संदेश दिया। उनका मानना था कि खिलाड़ी तभी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं जब उन पर परिणाम का अतिरिक्त बोझ नहीं होता। यही सोच भारत की ऐतिहासिक जीत का आधार बनी। रहाणे ने भारत के लिए कुल छह टेस्ट में कप्तानी की, जिनमें चार मुकाबले जीते और दो ड्रॉ रहे।
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