अमेरिका ने शनिवार को वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ़्लोरेस को काराकास से पकड़ा। दुनिया अमेरिका की कार्रवाई पर दो हिस्सों में बंट गई, कुछ देशों ने आलोचना, कुछ ने समर्थन किया। भारत ने किसी भी पक्ष का समर्थन या विरोध नहीं किया और गुटनिरपेक्ष नीति पर कायम रहा।
मलेशिया और दक्षिण अफ़्रीका ने अमेरिकी कार्रवाई की खुलकर निंदा की और वेनेज़ुएला के प्रति एकजुटता दिखाई। विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि भारत ने मलेशिया या दक्षिण अफ़्रीका की तरह कठोर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी। कई जानकार इसे भारत की पारंपरिक रुख़ के अनुसार देखते हैं, जिसमें वह किसी एक पक्ष के साथ नहीं दिखता।
दक्षिण एशियाई देशों ने संतुलित प्रतिक्रिया दी; किसी ने अमेरिका के हमले की सार्वजनिक निंदा नहीं की। विश्लेषक माइकल कुगलमैन के अनुसार, यह संतुलित प्रतिक्रिया आर्थिक संवेदनशीलता और सावधानी की आवश्यकता को दर्शाती है। भारत ने रविवार को विदेश मंत्रालय के बयान में कहा कि वेनेज़ुएला में हालिया घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय है।
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भारत ने वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई पर कोई कठोर बयान नहीं दिया, गुटनिरपेक्ष नीति पर कायम रहा
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सभी पक्षों से अपील की कि वेनेज़ुएला के लोगों की भलाई प्राथमिकता दें। विशेषज्ञ हैपीमोन जैकब ने कहा कि भारत का रुख़ नया नहीं है और इसे पांच कारण बताते हैं। जैकब ने कहा कि भारत ने रूस के यूक्रेन पर हमले की भी सार्वजनिक निंदा नहीं की थी। भारत बड़ी महाशक्तियों के प्रभाव क्षेत्र में काम करने के तरीके को समझता और दोहरे मानदंड से बचता है।
वेनेज़ुएला और यूक्रेन भारत के लिए रणनीतिक रूप से उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितने उसके पड़ोसी देश हैं। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने अमेरिकी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और निंदा की। दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने भी अमेरिका की कार्रवाई की सार्वजनिक निंदा की।
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि भारत से ग्लोबल साउथ नेतृत्व के अनुरूप बयान अपेक्षित था। सिब्बल ने कहा कि भारत संयम, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील कर सकता है। भारत अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों के खिलाफ सलाह दे सकता है, संवाद और कूटनीति से मतभेदों का समाधान सुझा सकता है। विकासशील देशों की संवेदनशीलता को लेकर चिंता ज़ाहिर करना भी भारत की जिम्मेदारी हो सकती है।
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