उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी का बचाव करने वाले 18 पूर्व न्यायाधीश सामने आए। उनके बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के 56 पूर्व न्यायाधीशों ने निंदा दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक सुविधा साधना खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म देता है। यह प्रवृत्ति न्यायपालिका की संस्थागत छवि को कमजोर कर सकती है और उसकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। इसी संदर्भ में न्यायविद अमित शाह ने भी कहा कि ऐसी बयानबाज़ी से न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है और यह लोकतंत्र के मूल स्तंभों में से एक को कमजोर करने जैसा है।
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अमित शाह के बयान पर विवाद
56 पूर्व न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि यह बयान केवल राजनीतिक पक्षपात छिपाने का साधन प्रतीत होता है।उन्होंने कहा कि इस प्रकार के रुख से न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंच सकती है।न्यायाधीशों के अनुसार, राजनीतिक हित साधने वाले बयानों को न्यायिक स्वतंत्रता के आवरण में छिपाया गया।यह परंपरा न्यायपालिका को राजनीतिक भूमिकाओं में उलझाकर उसकी गरिमा को कमजोर करने का खतरा बढ़ाती है।पूर्व न्यायाधीशों ने अपने बयान में कहा कि न्यायपालिका को राजनीति से पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए।उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग राजनीति चुनते हैं, उन्हें वहीं अपना पक्ष रखना चाहिए।
न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए उसे ऐसी राजनीतिक उलझनों से दूर रखना आवश्यक है।उन्होंने चेतावनी दी कि न्यायपालिका का राजनीतिकरण लोकतंत्र की संस्थागत मजबूती पर सीधा प्रहार करेगा।गौरतलब है कि 18 पूर्व न्यायाधीशों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणी की आलोचना की थी।अमित शाह ने सलवा जुडूम को भंग करने के फैसले पर बी. सुदर्शन रेड्डी को आड़े हाथों लिया था।पूर्व न्यायाधीशों ने शाह के हमले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए रेड्डी का बचाव किया था।अब 56 पूर्व न्यायाधीशों ने इस बचाव को अनुचित ठहराते हुए बड़ी आपत्ति जताई है।


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