May 6, 2026

Central Times

Most Trusted News on the go

शुभेंदु

शुभेंदु अधिकारी: अविवाहित ब्राह्मण नेता ने कैसे दिलाई बंगाल में जीत

शुभेंदु पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा नाम बन चुके हैं। कभी ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे शुभेंदु अधिकारी आज बंगाल में भाजपा के सबसे मजबूत चेहरों में गिने जाते हैं। विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस को लगातार चुनौती दी,राज्य की राजनीति का समीकरण बदल दिया। जिन्होंने भाजपा की बड़ी जीत में निर्णायक भूमिका निभाई। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे कई चेहरे रहे, शुभेंदु अधिकारी का योगदान सबसे अलग माना जा रहा है। भाजपा को राज्य में मजबूत स्थानीय नेतृत्व की जरूरत थी, यह कमी शुभेंदु के आने से पूरी हुई। उन्होंने संदेशखाली, आरजी कर अस्पताल विवाद और दुर्गा पूजा हिंसा जैसे मुद्दों पर ममता सरकार को घेरा। लगातार यात्राओं और जनसभाओं के जरिए उन्होंने पूरे बंगाल में पार्टी का आधार मजबूत किया।

Also Read: RCB को IPL के बीच बड़ा झटका, स्टार खिलाड़ी अचानक लौटा घर

शुभेंदु का राजनीतिक सफर और विरासत

उनके पिता शिशिर अधिकारी लंबे समय तक बंगाल की राजनीति के बड़े नेता रहे। परिवार का क्षेत्रीय प्रभाव पहले से मजबूत था, इसलिए राजनीति का माहौल उन्हें बचपन से मिला। उन्होंने 1989 में कांग्रेस की छात्र राजनीति से अपना सफर शुरू किया। उस समय बंगाल में वामपंथी संगठनों का दबदबा था, इसलिए पहचान बनाना आसान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष जारी रखा और 1995 में कांथी नगरपालिका के पार्षद बने। 1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई, तब शुभेंदु अधिकारी भी उनके साथ जुड़ गए। यहीं से उनकी सक्रिय चुनावी राजनीति की शुरुआत हुई। कई वर्षों तक उन्होंने पार्टी के मजबूत संगठनकर्ता के रूप में काम किया और ममता के भरोसेमंद नेताओं में शामिल रहे।

साल 2007 में नंदीग्राम आंदोलन ने शुभेंदु अधिकारी की राजनीति को नई पहचान दी। वामपंथी सरकार ने केमिकल हब के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित करने का फैसला लिया, जिससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी फैल गई। इसी समय शुभेंदु ने आंदोलन की कमान संभाली। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को एकजुट किया और भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी बनाई। वे सिर्फ भाषण देने वाले नेता नहीं थे, बल्कि रात में गांवों में रुककर लोगों का भरोसा जीतते थे। स्थानीय भाषा में संवाद और जमीनी जुड़ाव ने उन्हें जनता के बीच मजबूत बनाया। 14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग के बाद जब पूरा क्षेत्र भय में था, तब भी शुभेंदु पीछे नहीं हटे। उन्होंने घायलों की मदद की और लोगों के साथ खड़े रहे। इसी आंदोलन ने उन्हें जननेता बनाया और बाद में 2011 में वामपंथी सरकार के पतन की मजबूत नींव रखी।

Also Read: करण जौहर का मेट गाला डेब्यू, ग्लोबल मंच पर बढ़ी चमक