शेख हसीना के मामले पर भारत ने सोमवार को जारी बयान में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। न्यायाधिकरण ने एकतरफा फैसला सुनाया और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला। यह मामला आपराधिक से ज्यादा राजनीतिक दिखाई देता है, जिससे भारत का प्रत्यर्पण न करने का आधार मजबूत होता है। बांग्लादेशी न्यायाधिकरण के फैसले और अंतरिम सरकार की मांग के बावजूद भारत हसीना को सौंपने का इरादा नहीं दिखाता।
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शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर संधि की शर्तें बाधा बनती हैं
भारत-बांग्लादेश की 2013 की प्रत्यर्पण संधि केवल उन्हीं मामलों पर लागू होती है जो दोनों देशों में अपराध हों। इसमें संशोधन 2016 में हुआ था और इसी संधि के तहत भारत ने 2020 में दो दोषियों को लौटाया था। कानून कहता है कि प्रत्यर्पण तभी होगा जब अपराध पर न्यूनतम एक वर्ष की सजा हो और गिरफ्तारी वारंट मौजूद हो। हसीना के मामले में राजनीतिक पहलू और प्रक्रियागत खामियां इन शर्तों को जटिल बनाती हैं।
राजनीतिक अपराध और निष्पक्ष सुनवाई की कमी दो प्रमुख अड़चनें हैं
संधि का अनुच्छेद 6 राजनीतिक अपराधों में प्रत्यर्पण से इंकार की अनुमति देता है, हालांकि गंभीर अपराध इसमें शामिल नहीं हैं। भारत अनुच्छेद 8 के तहत यह भी दिखा सकता है कि न्यायाधिकरण ने निष्पक्ष सुनवाई का पालन नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र पहले ही अदालत की संरचना और न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठा चुका है। रिपोर्टें बताती हैं कि हसीना को वकील नहीं मिला और न्यायाधीशों पर सरकारी दबाव मौजूद था।
प्रत्यर्पण से इनकार करने पर कूटनीति और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है
बांग्लादेश भारत पर न्यायिक फैसलों का सम्मान न करने का आरोप लगा सकता है और कूटनीतिक तनाव बढ़ सकता है। हालांकि, संबंध टूटना मुश्किल है क्योंकि बांग्लादेश व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए भारत पर निर्भर है। यदि बांग्लादेश चीन-पाकिस्तान के करीब जाता है, तो भारत की रणनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। क्षेत्र में बढ़ते तनाव से भारत का पूर्वोत्तर और बंगाल की खाड़ी अधिक संवेदनशील हो सकता है।
शेख हसीना के पास कानूनी और राजनीतिक दोनों रास्ते खुले हैं
हसीना उच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती देकर सुनवाई की प्रक्रिया पर पुनर्विचार मांग सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं मामले की निष्पक्षता पर दबाव बढ़ा सकती हैं, भले वे फैसला न बदल सकें। वह भारत या किसी अन्य देश से सुरक्षा या शरण भी मांग सकती हैं। अवामी लीग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाकर सजा रोकने या नरमी लाने का प्रयास कर सकती है।
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