संसद के बजट सत्र के दौरान बढ़ते हंगामे के बीच विपक्षी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपकर राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि स्पीकर सदन की कार्यवाही निष्पक्ष तरीके से नहीं चला रहे हैं और लगातार विपक्षी नेताओं, खासकर राहुल गांधी, को अपनी बात पूरी रखने का अवसर नहीं दे रहे हैं। इसी क्रम में विपक्ष के 118 सांसदों ने रूल 94(सी) के तहत लोकसभा महासचिव को नोटिस दिया, जिसे कांग्रेस के डिप्टी लीडर गौरव गोगोई ने पेश किया, हालांकि इस पर राहुल गांधी के हस्ताक्षर शामिल नहीं हैं।
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अविश्वास प्रस्ताव के पीछे दलीलें
नोटिस में विपक्ष ने कई घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि 2 फरवरी को राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान अपना भाषण पूरा नहीं करने दिया गया। इसके बाद 3 फरवरी को आठ विपक्षी सांसदों को बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया, जिसे विपक्ष ने लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के रूप में बताया। इसके अलावा, 4 फरवरी की एक घटना का जिक्र करते हुए विपक्ष ने आरोप लगाया कि एक भाजपा सांसद को बिना किसी टोका-टाकी के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों पर निजी और आपत्तिजनक हमले करने की अनुमति दी गई, जबकि विपक्ष के अनुसार, उन बयानों में कांग्रेस सांसदों के खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए गए थे।
इसके साथ ही विपक्ष ने यह भी संकेत दिया कि यदि सदन में निष्पक्ष सुनवाई और समान अवसर नहीं मिले, तो वह लोकतांत्रिक तरीकों से अपना विरोध और तेज करेगा। विपक्षी नेताओं का कहना है कि संसद केवल सरकार की आवाज़ नहीं, बल्कि जनता की चिंताओं को सामने लाने का मंच है, इसलिए स्पीकर की भूमिका संतुलन बनाए रखने में सबसे अहम हो जाती है।
लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सवाल
विपक्ष ने साफ किया कि वह स्पीकर पद का व्यक्तिगत रूप से सम्मान करता है, लेकिन उसे इस बात का गहरा अफसोस है कि लोकसभा में जनता से जुड़े अहम मुद्दों को उठाने से विपक्षी सांसदों को बार-बार रोका जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि स्पीकर, जिन्हें संसदीय प्रक्रिया और गरिमा का संरक्षक होना चाहिए, अगर ऐसे बयानों और फैसलों को मंच देते हैं, तो यह संवैधानिक संस्था की भावना के खिलाफ जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सदन की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संतुलन पर भरोसा बना रह पाएगा.
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