संसद का मॉनसून सत्र गुरुवार को विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी के बीच अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कार्यवाही समाप्त करने से पहले सदन में वंदे मातरम का गान कराया. सत्र खत्म होने के बाद बिरला ने अपने चैंबर में फ्लोर लीडर्स के लिए पारंपरिक चाय पार्टी आयोजित की. इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत सत्ता पक्ष के कई नेता पहुंचे. विपक्ष की ओर से हालांकि ज्यादातर नेताओं ने कार्यक्रम का बहिष्कार किया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी चाय पार्टी में शामिल नहीं हुए.
विपक्ष से सिर्फ कनिमोझी पहुंचीं
विपक्षी दलों के बहिष्कार के बीच डीएमके सांसद एमके कनिमोझी की चाय पार्टी में मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी. कनिमोझी विपक्ष की तरफ से कार्यक्रम में पहुंचने वाली एकमात्र प्रमुख नेता रहीं. खास बात यह है कि पिछले साल मॉनसून सत्र के बाद आयोजित इसी तरह की चाय पार्टी में डीएमके ने भी हिस्सा नहीं लिया था. इस बार कनिमोझी के शामिल होने को डीएमके और विपक्षी दलों के बीच बदलते समीकरण के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि केवल एक कार्यक्रम में मौजूदगी के आधार पर किसी बड़े राजनीतिक गठजोड़ का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी.
डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में हाल के दिनों में तनाव की चर्चा रही है. तमिलनाडु की राजनीति में भी दोनों दलों के बीच समीकरणों को लेकर कई तरह की अटकलें सामने आती रही हैं. इसी बीच डीएमके ने संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग भी की थी. ऐसे माहौल में कनिमोझी का लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी में पहुंचना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या डीएमके विपक्षी गठबंधन के भीतर अपनी रणनीति को नए सिरे से तय कर रही है या फिर यह सिर्फ संसदीय परंपरा के तहत लिया गया फैसला था.
परिसीमन बिल के लिए डीएमके क्यों अहम?
परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को लेकर केंद्र सरकार के लिए डीएमके का रुख महत्वपूर्ण हो सकता है. डीएमके के पास लोकसभा में 22 सांसद हैं और संविधान संशोधन से जुड़े किसी महत्वपूर्ण विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को पर्याप्त समर्थन जुटाना होगा. इससे पहले अप्रैल में हुए विशेष सत्र के दौरान परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर विपक्षी दलों ने सरकार का विरोध किया था. डीएमके ने भी उस समय विधेयक के खिलाफ मतदान किया था. ऐसे में अब डीएमके के रुख में किसी संभावित बदलाव पर राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है.
लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. मौजूदा संख्या को देखते हुए एनडीए के लिए यह आंकड़ा अपने दम पर हासिल करना आसान नहीं है. विभिन्न सहयोगी और अन्य दलों के संभावित समर्थन को जोड़ने के बाद भी सरकार को अतिरिक्त सांसदों की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन संख्या के लिहाज से अहम हो जाता है. यही वजह है कि कनिमोझी की चाय पार्टी में मौजूदगी को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है. हालांकि डीएमके ने अभी ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है कि वह परिसीमन विधेयक पर सरकार का समर्थन करने जा रही है.
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