बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। पश्चिम बंगाल और असम में कांग्रेस के ज्यादातर विजेता मुस्लिम समुदाय से आए, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। इसने दोनों दलों की अलग-अलग चुनावी रणनीतियों को साफ कर दिया। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के केवल 2 विधायक जीते और दोनों ही मुस्लिम समुदाय से हैं। फरक्का सीट से मोताब शेख और रानीनगर से जुल्फिकार अली ने जीत दर्ज की। इस तरह राज्य में कांग्रेस के 100 प्रतिशत विधायक मुस्लिम बने। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि पार्टी ने अल्पसंख्यक वोट बैंक पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। कांग्रेस ने सिर्फ विधायकों तक ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों के चयन में भी बड़ा दांव खेला। पार्टी ने राज्य में सबसे अधिक 78 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे।
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बंगाल में कांग्रेस का मुस्लिम प्रतिनिधित्व मजबूत
दूसरी ओर बीजेपी ने इस बार एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया। 2021 के चुनाव में बीजेपी ने 9 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 6 दूसरे स्थान पर रहे थे। असम में भी कांग्रेस का प्रदर्शन इसी पैटर्न पर दिखा। यहां पार्टी के 19 विधायकों में से 18 मुस्लिम हैं। यानी लगभग 95 प्रतिशत विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं। केवल लखीमपुर के नवबोइचा सीट से डॉ. जॉय प्रकाश दास गैर-मुस्लिम विधायक बने। यह सीट कांग्रेस की पारंपरिक मजबूत सीट मानी जाती है। खास बात यह रही कि कांग्रेस के सभी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे। इससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी ने इस समुदाय के बीच मजबूत विश्वास कायम रखा है। असम में यह परिणाम भविष्य की राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
केरल में तस्वीर थोड़ी अलग दिखी। राज्य में सामाजिक संतुलन अधिक विविध है, जहां ईसाई, मुस्लिम और हिंदू समुदायों का अलग-अलग प्रभाव देखने को मिलता है। यहां कांग्रेस के 62 विधायकों में 8 मुस्लिम विधायक चुने गए, जो लगभग 13 प्रतिशत हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीजेपी द्वारा तीनों राज्यों में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार न उतारना एक स्पष्ट रणनीतिक फैसला है। पार्टी अपने कोर वोट बैंक पर भरोसा दिखा रही है, जबकि कांग्रेस सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने के लिए अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व बढ़ा रही है। 2026 के नतीजों ने यह साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में टिकट वितरण केवल उम्मीदवार नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी तय करता है। बंगाल और असम जैसे राज्यों में यह बदलाव आने वाले चुनावों में और गहरा असर डाल सकता है।
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