पीएम मोदी इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में आयोजित समारोह में सक्रिय रूप से शामिल हुए। उन्होंने वंदे मातरम के पूर्ण संस्करण के सामूहिक गायन में भाग लेकर कार्यक्रम को विशेष बनाया। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल भी लॉन्च किया। स्मरणोत्सव 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक पूरे वर्ष आयोजित किया जाएगा।
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स्मरणोत्सव का शुभारंभ और कार्यक्रम | पीएम मोदी
प्रधानमंत्री मोदी इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में आयोजित भव्य समारोह में शामिल हुए, जहाँ हजारों प्रतिभागियों ने राष्ट्रीय उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। उन्होंने मंच पर पहुंचकर वंदे मातरम के पूर्ण संस्करण के सामूहिक गायन में सक्रिय रूप से भाग लिया और इस पहल को राष्ट्र की भावनाओं से जुड़ा हुआ करार दिया। पीएम मोदी ने एक विशेष डिजिटल पोर्टल भी लॉन्च किया, जिसका उद्देश्य लोगों को स्मरणोत्सव से जुड़े कार्यक्रमों और गतिविधियों की ऑनलाइन जानकारी प्रदान करना है। यह वर्षभर चलने वाला समारोह 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक पूरे देश में विविध आयोजनों के माध्यम से मनाया जाएगा, जिससे देश के सभी हिस्सों में जनभागीदारी को प्रोत्साहन मिलेगा।
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पीएम मोदी का संबोधन और राष्ट्रीय संदेश
अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और स्वतंत्रता संघर्ष की प्रेरणा का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह गीत भारतीयों को एक सूत्र में बांधने वाली शक्ति रहा है, इसलिए इसका 150वां वर्ष राष्ट्रीय गौरव का महत्वपूर्ण अवसर है। प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि पूरे देश में एक ही समय पर सुबह 9:50 बजे वंदे मातरम का सामूहिक गायन किया जाएगा, जिससे देश में एकता और भावनात्मक समरसता का संदेश जाएगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यह स्मरणोत्सव युवा पीढ़ी को देश के सांस्कृतिक इतिहास से जोड़ने का अवसर प्रदान करेगा।
वंदे मातरम को बंकिमचंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के दिन लिखा, जो उस समय बंगाल में सांस्कृतिक जागरण का महत्वपूर्ण काल था। उन्होंने इस गीत को अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। यह रचना पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित हुई, जहाँ इसे पाठकों ने अत्यधिक सराहा। समय के साथ यह गीत भारतीय स्वाधीनता संग्राम का प्रतीक बन गया और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा। आज 150 वर्ष बाद भी यह गीत भारतीय जनमानस में उसी उत्साह और सम्मान के साथ जीवित है।
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