उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से लाए गए यूजीसी (UGC) के नए नियमों को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। एक ओर इन नियमों को समानता की दिशा में कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इनका विरोध भी बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में छात्रों ने नियमों के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसके साथ ही कई राजनीतिक नेताओं ने नियमों को वापस लेने या उनमें संशोधन की मांग की है।
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UGC विनियम 2026 को लेकर शिक्षा और राजनीति के बीच बढ़ता टकराव
इस मुद्दे ने अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर भी हलचल पैदा कर दी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से यह भरोसा दिला रहे हैं कि नए नियम किसी वर्ग के खिलाफ नहीं हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर कई कार्यकर्ता और कुछ नेता खुलकर विरोध जता रहे हैं। इसी बीच, अलग-अलग राज्यों से बीजेपी पदाधिकारियों के इस्तीफे की खबरें भी सामने आई हैं। परिणामस्वरूप, यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर समर्थन और विरोध किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। बीजेपी, कांग्रेस और अन्य दलों से जुड़े लोग दोनों पक्षों में नजर आ रहे हैं। इसलिए, यह मामला अब पार्टी राजनीति से ऊपर उठकर एक व्यापक सामाजिक बहस बन गया है।
बीजेपी, कांग्रेस और अन्य दलों में बंटा नजर आया यूजीसी नियमों पर रुख
गौरतलब है कि 13 जनवरी को यूजीसी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम 2026 जारी किया था। आयोग के अनुसार, इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना है। अधिसूचना में यह प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक संस्थान में एक इक्विटी कमेटी का गठन किया जाएगा। इस समिति में ओबीसी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांग और महिला वर्ग के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी और समाधान सुनिश्चित करेगी। हालांकि, विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों की व्याख्या और क्रियान्वयन को लेकर अभी भी कई आशंकाएं बनी हुई हैं। इसी वजह से, विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है।
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