सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर अपने पुराने फैसले को पलटते हुए कहा है कि अगर कोई संस्थान कानून के तहत स्थापित है, तो वह अल्पसंख्यक संस्थान होने का दावा कर सकता है। कोर्ट ने 1967 के ‘अजीज बाशा बनाम भारत गणराज्य’ मामले में दिए गए अपने निर्णय को बदलते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अब, AMU का अल्पसंख्यक दर्जा बरकरार रहेगा या नहीं, इस पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा 4-3 के बहुमत से लिया गया है। पीठ में शामिल मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस जेडी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा ने संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत AMU के अल्पसंख्यक दर्जे को बनाए रखने के पक्ष में फैसला दिया।
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AMU के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, विपरीत फैसला देने वाली पीठ भी शामिल
पीठ में शामिल जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने विपरीत फैसला दिया। साल 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना था। उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर सुनवाई पूरी कर सुप्रीम कोर्ट ने बीती 1 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
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1981 में संशोधन से बरकरार हुआ दर्जा
साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने मामले को सात जजों की पीठ के पास भेज दिया था। सुनवाई के दौरान सवाल उठा था कि क्या कोई विश्वविद्यालय, जिसका प्रशासन सरकार द्वारा किया जा रहा है, क्या वह अल्पसंख्यक संस्थान होने का दावा कर सकता है? साल 1967 में अजीज बाशा बनाम भारत गणराज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा खारिज कर दिया था। हालांकि साल 1981 में सरकार ने एएमयू एक्ट में संशोधन कर विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा फिर से बरकरार कर दिया गया था।
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