कांगड़ा जिले में एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर निगरानी काफी कमजोर नजर आ रही है। जिले में बिना डॉक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक्स आसानी से उपलब्ध हो रही हैं, जिससे दवाओं के गलत इस्तेमाल और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जन स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कांगड़ा में निगरानी व्यवस्था इसलिए भी प्रभावित हुई है क्योंकि सहायक ड्रग कंट्रोलर के पास मंडी जिले का अतिरिक्त प्रभार भी है। दो बड़े जिलों की जिम्मेदारी संभालने के कारण नियमित निरीक्षण और जांच ठीक से नहीं हो पा रही है। अधिकारी हर सप्ताह या हर महीने मेडिकल स्टोरों की निगरानी नहीं कर पाते, जिससे नियमों का पालन ढीला पड़ गया है।
वर्तमान व्यवस्था में केवल शेड्यूल एच-1 श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाओं का ही रिकॉर्ड रखा जाता है, जबकि अन्य एंटीबायोटिक्स पर कोई सख्त नियंत्रण नहीं है। कई दवा विक्रेता डॉक्टर की पर्ची की फोटोकॉपी रखते हैं, लेकिन बिना पर्ची भी दवाएं सीधे ग्राहकों को दे देते हैं। इस तरह के मामलों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से नियमों का उल्लंघन लगातार जारी है।
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नियमों की अनदेखी और कमजोर निगरानी
कुछ मेडिकल स्टोर संचालक शेड्यूल एच-1 दवाओं का रिकॉर्ड रखने से बचते हैं और इन्हें अपने पास रखना भी नहीं चाहते, जबकि अन्य दुकानों पर इनकी बिक्री जारी रहती है। इससे स्पष्ट होता है कि दवा बिक्री नियमों का पालन सभी जगह समान रूप से नहीं हो रहा है और निगरानी तंत्र में कई खामियां मौजूद हैं।
दवा नियंत्रक विभाग के पास विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई के दो तरीके हैं। विभागीय कार्रवाई के तहत लाइसेंस रद्द किया जा सकता है, जबकि कानूनी कार्रवाई में अधिनियम के तहत सजा का प्रावधान है। हालांकि, केमिस्ट एसोसिएशन के प्रतिनिधियों का कहना है कि अधिकांश डॉक्टर पर्ची पर ही एंटीबायोटिक लिखते हैं और दिशानिर्देशों का पालन किया जाता है।
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि समय-समय पर पुलिस और जांच एजेंसियों के साथ मिलकर अभियान चलाए जाते हैं और प्रतिबंधित दवाओं की बिक्री की जांच की जाती है। अधिकारियों के अनुसार, शेड्यूल एच-1 एंटीबायोटिक्स बिना पर्ची नहीं दी जा सकतीं और चिकित्सकों को डब्ल्यूएचओ की उपचार गाइडलाइन का पालन करने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है।
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