April 24, 2026

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10 मिनट, 1650 गोलियां और खूनखराबा: जलियांवाला बाग की दर्दनाक कहानी

Jallianwala Bagh Massacre 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जालियांवाला बाग में रौलट एक्ट के विरोध में हजारों लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए जुटे थे। इसी दौरान Reginald Edward Harry Dyer ने बिना किसी चेतावनी के अपने सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया। लगभग 10 मिनट तक चली इस अंधाधुंध फायरिंग में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। बाग का एकमात्र निकास द्वार बंद होने के कारण लोग बच नहीं सके, कई लोग जान बचाने के लिए कुएं में कूद गए।

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जलियांवाला बाग नरसंहार: जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी

Rowlatt Act के तहत अंग्रेजों ने बिना मुकदमे के गिरफ्तारी का अधिकार हासिल कर लिया था, जिससे जनता में भारी आक्रोश था। Mahatma Gandhi के नेतृत्व में पूरे देश में इसका विरोध हो रहा था, खासकर पंजाब में स्थिति गंभीर थी। लेफ्टिनेंट गवर्नर Michael O’Dwyer ने विरोध को कुचलने के लिए सख्त कदम उठाए और डायर को कार्रवाई की जिम्मेदारी दी। इसके बावजूद लोग अपने अधिकारों के लिए डटे रहे और उसी विरोध के तहत यह सभा आयोजित हुई थी।

इस नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया और स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। Udham Singh ने इस घटना का बदला लेने की कसम खाई और 1940 में लंदन में माइकल ओ’डायर की हत्या कर दी। वहीं, इस घटना का असर Bhagat Singh जैसे युवाओं पर भी पड़ा, जिन्होंने बचपन में ही इस स्थल से प्रेरणा लेकर क्रांतिकारी रास्ता चुना। इस घटना ने लोगों के मन में आज़ादी की ज्वाला को और प्रज्वलित किया।

इस कांड के बाद देशभर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुस्सा बढ़ गया। Rabindranath Tagore ने अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी और गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने Hunter Commission का गठन किया, जिसने सीमित जांच में 379 मौतों की पुष्टि की, जबकि कांग्रेस की जांच में यह संख्या 1000 से अधिक बताई गई। इस घटना ने ब्रिटिश शासन की क्रूरता को उजागर किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत नैतिक आधार प्रदान किया।

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