ईरान युद्ध के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि देश के क्रूड ऑयल भंडार फिलहाल लगभग दो-तिहाई भरे हुए हैं। यह क्रूड ऑयल भंडार किसी भी आपूर्ति संकट के दौरान अल्प अवधि के लिए बफर के रूप में काम कर सकते हैं और अचानक पैदा होने वाली वैश्विक अस्थिरता के असर को कम करने में मददगार साबित होते हैं। चूंकि भारत अपनी कुल जरूरतों का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ऐसे रणनीतिक क्रूड ऑयल भंडार देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। सरकार का कहना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा सुरक्षा पर विशेष फोकस रखा जा रहा है।
भारत में रणनीतिक क्रूड ऑयल भंडारण की सुविधा आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और कर्नाटक के मंगलुरु व पडूर में विकसित की गई है, जिनकी कुल क्षमता 53.3 लाख मीट्रिक टन है। ये भूमिगत भंडार इस तरह से तैयार किए गए हैं कि लंबे समय तक सुरक्षित रूप से क्रूड ऑयल को संरक्षित रखा जा सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत उपयोग में लाया जा सके। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने बताया कि इन भंडारों का संचालन इंडियन स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (ISPRL) के माध्यम से किया जाता है, जिससे किसी भी आपात स्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सहायता मिलती है।
क्रूड ऑयल भंडार की मौजूदा स्थिति
सरकार के अनुसार, इस समय ISPRL के पास लगभग 33.72 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल उपलब्ध है, जो कुल क्षमता का करीब 64 प्रतिशत है। हालांकि, यह मात्रा स्थिर नहीं रहती और बाजार की स्थिति, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा घरेलू खपत के अनुसार इसमें लगातार बदलाव होता रहता है। यही कारण है कि वास्तविक रूप से यह भंडार कितने दिनों तक देश की जरूरतों को पूरा कर सकता है, इसका कोई निश्चित आंकड़ा नहीं होता, बल्कि यह एक गतिशील स्थिति बनी रहती है।
इसके अलावा, सरकार समय-समय पर इन भंडारों को भरने और संतुलित बनाए रखने के लिए रणनीतिक खरीदारी भी करती है। विशेष रूप से तब, जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होती हैं, तब अधिक मात्रा में खरीद कर भंडारण बढ़ाने की कोशिश की जाती है। इससे भविष्य में कीमतों में अचानक वृद्धि होने पर देश को आर्थिक दबाव से राहत मिलती है और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता बनाए रखने में भी मदद मिलती है।
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भविष्य की तैयारी और आयात में विविधता
सरकार ने आगे की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भंडारण क्षमता बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। जुलाई 2021 में ओडिशा और कर्नाटक में 65 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले दो नए वाणिज्यिक-सह-रणनीतिक भंडार स्थापित करने को मंजूरी दी गई थी। इस पहल का उद्देश्य न केवल मौजूदा भंडारण को मजबूत करना है, बल्कि भविष्य में संभावित वैश्विक संकटों के दौरान देश को अधिक सुरक्षित बनाना भी है। इससे ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इसके साथ ही, भारत ने अपने कच्चे तेल के आयात स्रोतों को भी व्यापक रूप से विविध बनाया है। अब देश इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के अलावा अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला, कनाडा, ब्राजील और मैक्सिको सहित कुल 41 देशों से तेल आयात कर रहा है। यह रणनीति किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता को कम करती है और वैश्विक राजनीतिक तनाव या आपूर्ति बाधाओं के बावजूद देश में तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद करती है।
दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हालात में कुछ नरमी देखने को मिली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को लेकर रुख में ढील देने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर समयसीमा बढ़ाने के बाद बाजार में सकारात्मक संकेत देखने को मिले हैं। इसके परिणामस्वरूप वॉल स्ट्रीट में तेजी आई और वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। साथ ही, ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि ईरान के साथ बातचीत में प्रगति हो रही है, जिससे वैश्विक बाजार में अनिश्चितता कुछ हद तक कम हुई है और भारत जैसे आयातक देशों को भी राहत मिलने की उम्मीद जगी है।
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