सार्वजनिक प्राधिकरणों की लापरवाही से होने वाली मौतों को लेकर एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और देशभर में इसके लिए स्पष्ट नियम बनाने की मांग की। याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि सरकारी विभागों या अधिकारियों की लापरवाही के कारण यदि किसी व्यक्ति की मौत होती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए एक ठोस व्यवस्था बनाई जाए। याचिका में कहा गया कि ऐसी घटनाओं को रोकने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिशानिर्देश बनाना जरूरी है।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कई अलग-अलग प्रकार की घटनाओं का जिक्र किया और अदालत से इन सभी मामलों के लिए एक समान प्रक्रिया तय करने की मांग रखी। उसका कहना था कि देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी एजेंसियों की लापरवाही के कारण कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं, लेकिन इसके लिए जवाबदेही तय करने का कोई स्पष्ट और प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है। इसी वजह से उसने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप कर एक मानक प्रक्रिया (SOP) बनाने की मांग की।
हालांकि सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस याचिका पर आपत्ति जताई और इसे बहुत व्यापक बताया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने एक ही याचिका में इतने अलग-अलग मुद्दे जोड़ दिए हैं कि यह किसी शोरूम या शॉपिंग मॉल की तरह लगती है। अदालत ने संकेत दिया कि इतनी विविध समस्याओं को एक साथ जोड़कर समाधान मांगना व्यावहारिक नहीं है।
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याचिका में कई अलग-अलग हादसों का जिक्र
याचिका में असुरक्षित ढांचों, अधूरे निर्माण कार्यों और खराब वायरिंग के कारण करंट लगने से होने वाली मौतों का जिक्र किया गया था। इसके अलावा पुल गिरने की घटनाएं, हिरासत में मौत, गड्ढों से होने वाले हादसे और अन्य दुर्घटनाओं को भी इसमें शामिल किया गया था। अदालत ने कहा कि इन सभी मुद्दों को एक साथ जोड़ने से याचिका का दायरा बहुत बड़ा हो गया है और इसे एक ही मामले के रूप में देखना मुश्किल हो जाता है।
याचिकाकर्ता ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि उसने कई बार संबंधित अधिकारियों के पास शिकायतें दर्ज कराई थीं, लेकिन अधिकारियों ने इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसी कारण उसने अदालत से मांग की कि सरकारी विभागों की लापरवाही से होने वाली मौतों के मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। उसका कहना था कि अगर स्पष्ट नियम बनेंगे तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और कहा कि पूरे देश के लिए एक समान SOP बनाना व्यावहारिक नहीं होगा। अदालत ने यह भी बताया कि सभी राज्यों की आर्थिक स्थिति और संसाधन अलग-अलग होते हैं। कई राज्यों के पास सीमित वित्तीय साधन हैं और कुछ राज्यों को तो अपने कर्मचारियों की सैलरी देने के लिए भी उधार लेना पड़ता है। ऐसे में अदालत ने कहा कि इतने व्यापक मुद्दों पर सामान्य निर्देश देना संभव नहीं है, खासकर तब जब मामला किसी एक राज्य से विशेष रूप से संबंधित न हो।
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