पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार एक अनोखी सीट चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जहां मुकाबला किसी दो नेताओं के बीच नहीं, बल्कि मां और बेटे के बीच हो रहा है। जलपाईगुड़ी जिले की डबग्राम-फुलबाड़ी सीट पर शिखा चटर्जी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं, जबकि रंजन शील शर्मा तृणमूल कांग्रेस की ओर से मैदान में हैं। खास बात यह है कि शिखा चटर्जी ने ही रंजन का पालन-पोषण किया है और दोनों एक-दूसरे को मां-बेटे के रूप में स्वीकार करते हैं।
संघर्षों भरा बचपन, मां ने दी परवरिश और राजनीति की राह
रंजन शील शर्मा का बचपन काफी मुश्किलों में बीता। उनके पिता के निधन के बाद उनकी मां उन्हें शिखा चटर्जी के पास छोड़ गई थीं। बाद में जब उनकी मां का भी देहांत हो गया, तो शिखा ने बंगाल में ही उन्हें अपने बेटे की तरह पाला और बड़ा किया। आज भी रंजन उन्हें अपनी मां मानते हैं। शिखा चटर्जी ने न सिर्फ रंजन की परवरिश की, बल्कि उन्हें राजनीति में आगे बढ़ने की राह भी दिखाई। एक समय ऐसा था जब दोनों ही तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़े हुए थे। हालांकि, बाद में मतभेदों के चलते शिखा ने पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया, जबकि रंजन टीएमसी में ही बने रहे।
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बंगाल में मां के खिलाफ मैदान में बेटा, रिश्तों से ऊपर विचारों की लड़ाई
2021 के विधानसभा चुनाव में शिखा चटर्जी ने बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की थी और वह वर्तमान में इस सीट की विधायक हैं। उन्होंने टीएमसी के वरिष्ठ नेता गौतम देब को हराया था। उस दौरान यह भी कहा गया था कि रंजन ने अपनी मां के खिलाफ प्रचार नहीं किया था। वर्तमान में रंजन शील शर्मा सिलिगुड़ी नगर निगम के वार्ड नंबर 37 के पार्षद हैं और दार्जिलिंग जिले में पार्टी के महासचिव भी हैं। इस बार वह अपनी ही मां के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर गए हैं।
टिकट मिलने के बाद वह सबसे पहले अपनी मां का आशीर्वाद लेने पहुंचे और विश्वास जताया कि वह जीत हासिल करेंगे। वहीं, शिखा चटर्जी का कहना है कि यह मुकाबला मां-बेटे का नहीं, बल्कि विचारधाराओं का है। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत रिश्ते अपनी जगह हैं और आगे भी बने रहेंगे, लेकिन राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें अफसोस है कि वह अपने बेटे को अपनी विचारधारा से नहीं जोड़ सकीं।
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