सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के पास लॉ छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट के तहत BCI या स्टेट बार काउंसिल का अधिकार किसी छात्र के वकील के रूप में एनरोल होने के बाद शुरू होता है। इससे पहले छात्र के आचरण पर कार्रवाई करने का अधिकार संबंधित विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान के पास रहता है। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह फैसला सुनाया।
NALSAR छात्रों के विवाद से जुड़ा मामला
यह मामला हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों से जुड़ा था। BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने 13 अगस्त को 2026 में ग्रेजुएट होने वाले छात्रों के पूरे बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ जांच की बात भी कही गई थी। यह कार्रवाई CJI के खिलाफ छात्रों के अभियान को लेकर की गई थी। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद BCI चेयरमैन ने करीब एक घंटे के अंदर ही अपना आदेश वापस ले लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को सुनवाई के दौरान BCI की कार्रवाई पर नाराजगी जताई थी। अदालत ने तब NALSAR के छात्रों और फैकल्टी को BCI या किसी स्टेट बार काउंसिल की दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा दी थी। गुरुवार को कोर्ट ने इस सुरक्षा को स्थायी कर दिया और याचिका का निपटारा कर दिया। याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर ने कहा कि BCI को यह बताना चाहिए कि आदेश किसके कहने पर और किस कानूनी प्रावधान के तहत जारी हुआ था।
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सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों को दी स्थायी सुरक्षा
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि मामला केवल छात्रों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं है। इसमें विश्वविद्यालय में अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल भी शामिल है। उन्होंने BCI की जवाबदेही तय करने की मांग की। दूसरी ओर, BCI चेयरमैन ने अदालत को बताया कि संबंधित निर्देश वापस लिए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि BCI की बैठक में भी इस मुद्दे को समाप्त कर दिया गया है।
अदालत ने इस दौरान BCI के अधिकार क्षेत्र को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी। CJI ने कहा कि लॉ की पढ़ाई कर रहे छात्रों पर BCI का अनुशासनात्मक अधिकार लागू नहीं होता। किसी छात्र के वकील के रूप में एनरोल होने के बाद ही BCI उसके पेशेवर आचरण को नियंत्रित कर सकती है। इसलिए छात्र जीवन के दौरान अनुशासन से जुड़े मामलों पर संबंधित विश्वविद्यालय या संस्थान ही अपने नियमों के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।


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