इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता किसी अंतिम समझौते पर नहीं पहुंच सकी, लेकिन पाकिस्तान ने इसे पूरी तरह विफल मानने से इनकार किया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री Ishaq Dar ने कहा कि दोनों पक्ष अब भी युद्धविराम के लिए प्रतिबद्ध हैं और बातचीत जारी रखने की इच्छा रखते हैं। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान ने सेना प्रमुख Asim Munir के साथ मिलकर इस जटिल वार्ता को संभव बनाने में अहम भूमिका निभाई। अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance और ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने भी पाकिस्तान की मेज़बानी और प्रयासों की सराहना की, जिससे उसकी कूटनीतिक साख को बल मिला।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी उच्चस्तरीय वार्ताओं में तुरंत परिणाम की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होता। ईरान के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने भी स्वीकार किया कि कई मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन कुछ अहम बिंदुओं पर मतभेद बने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत अविश्वास के माहौल में शुरू हुई थी, इसलिए एक ही बैठक में व्यापक समझौता होना कठिन था। इसके बावजूद दोनों देशों ने संवाद का रास्ता खुला रखा है, जो इस प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
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लेकिन मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान को मिली वैश्विक पहचान
विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने दशकों बाद अमेरिका और ईरान को आमने-सामने बैठाने में कामयाबी हासिल की। 1979 के बाद इस स्तर की सीधी बातचीत पहली बार हुई है, जो अपने आप में ऐतिहासिक मानी जा रही है। वरिष्ठ नेता Mushahid Hussain Syed ने कहा कि करीब 21 घंटे चली वार्ता में तकनीकी विशेषज्ञों और उच्चस्तरीय नेताओं की भागीदारी ने इसकी गंभीरता को दर्शाया। इस प्रक्रिया ने पाकिस्तान को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया है।
हालांकि अंतिम समझौता न होने से कुछ निराशा जरूर है, लेकिन विशेषज्ञ इसे एक लंबी प्रक्रिया की शुरुआत मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगर आगे भी वार्ता जारी रहती है, तो पाकिस्तान की भूमिका और मजबूत हो सकती है। फिलहाल यह साफ है कि इस पहल ने पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत किया है और उसे वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है।
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