April 29, 2026

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बंगाल चुनाव: नेताओं से ज्यादा प्रभावशाली बने रणनीतिक संगठन

पिछले सात–आठ वर्षों में पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। अब चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने की जिम्मेदारी पारंपरिक नेताओं के हाथों से निकलकर बाहरी पेशेवर संगठनों के पास चली गई है। राजनीतिक दल इन संगठनों पर पहले से कहीं अधिक निर्भर हो गए हैं। इससे फैसले लेने की प्रक्रिया का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अब चुनावी अभियान अधिक संगठित और पेशेवर तरीके से संचालित हो रहा है। सत्ता में मौजूद तृणमूल कांग्रेस ने अपनी रणनीतिक जिम्मेदारी आई-पैक को सौंप दी है, जिसे Prashant Kishor ने स्थापित किया था। पार्टी नेतृत्व ने 2019 के बाद इस संगठन को मजबूती से जोड़ा। 2021 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की जीत में इसकी अहम भूमिका मानी जाती है।

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पश्चिम बंगाल में चुनावी रणनीति पर बाहरी संगठनों का बढ़ता नियंत्रण

अब गांव से लेकर जिला स्तर तक फैसले आई-पैक की टीम लेती है। उम्मीदवार चयन और प्रचार की रणनीति भी इसी के निर्देशों पर तय होती है। आई-पैक केवल सलाह देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह रणनीति तैयार करने और उसके क्रियान्वयन की निगरानी भी करता है। पार्टी के भीतर इसकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई है कि बिना इसके निर्देश के कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जाता। जांच एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान भी इसके प्रभाव की झलक दिखी। शीर्ष नेतृत्व को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा, जिससे इसकी गहरी पकड़ सामने आई। इससे साफ है कि संगठन पार्टी के निर्णयों में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। यह टीम राजनीतिक संदेश तैयार करने और प्रचार को दिशा देने में अहम भूमिका निभाती है। बड़े नेताओं के कार्यक्रमों से लेकर छोटे अभियानों तक हर चीज़ का निर्णय इसी स्तर पर होता है।

कोलकाता के न्यू टाउन इलाके के पांच सितारा होटलों से इस रणनीति का संचालन किया जा रहा है। यहां से उम्मीदवारों के प्रचार, स्टार प्रचारकों की तैनाती और अभियान की योजना बनाई जाती है। हालांकि, इस व्यवस्था में कुछ गलतियां भी सामने आई हैं। इसके बावजूद आईटी सेल का अभियान प्रबंधन काफी प्रभावी माना जा रहा है। केंद्रीय नेतृत्व भी इसी ढांचे पर भरोसा कर रहा है। इस पूरी स्थिति का असर यह हुआ है कि दोनों प्रमुख दलों के पारंपरिक नेता निर्णय प्रक्रिया में पीछे छूटते दिख रहे हैं। अब वे इन संगठनों द्वारा तय दिशा-निर्देशों को लागू करने तक सीमित हो गए हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह बदलाव अभूतपूर्व माना जा रहा है। चुनावी रणनीति अब पूरी तरह पेशेवर और डेटा आधारित हो गई है। आने वाले समय में यह मॉडल और भी मजबूत हो सकता है।

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