भारत के भुगतान संतुलन (BoP) पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी निवेश आकर्षित करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 5 जून को घोषित उपायों का उद्देश्य देश में विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाना, रुपये को मजबूती देना और वित्तीय बाजारों को अधिक स्थिर बनाना है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और भारतीय बाजारों से विदेशी पूंजी निकासी के कारण भारत का भुगतान संतुलन दबाव में आया है, जिसे सुधारने के लिए सरकार और RBI ने संयुक्त रणनीति अपनाई है।
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भुगतान संतुलन सुधारने के लिए RBI और केंद्र ने उठाए बड़े कदम
RBI ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकारी बॉन्ड और इक्विटी में निवेश को प्रोत्साहित किया है। केंद्रीय बैंक ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) को 30 सितंबर तक रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा उपलब्ध कराई है, जिससे वे कम लागत पर विदेशी ऋण जुटा सकेंगी। इसके अलावा, RBI ने तीन से पांच वर्ष की नई FCNR(B) जमा योजनाओं पर हेजिंग लागत स्वयं वहन करने का फैसला किया है। इन उपायों से विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने और कंपनियों के लिए विदेशी फंडिंग को आसान बनाने की उम्मीद है।
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कर छूट और बॉन्ड सुधारों से विदेशी निवेश बढ़ाने पर जोर
केंद्र सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में निवेश को अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से कई कर राहतें दी हैं। सरकार ने सरकारी बॉन्ड पर अर्जित ब्याज, लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) और विदहोल्डिंग टैक्स को समाप्त कर दिया है। साथ ही RBI ने 15, 30 और 40 वर्ष की नई सरकारी प्रतिभूतियों को Fully Accessible Route (FAR) के तहत शामिल किया है, जिससे विदेशी निवेशकों को लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेश की अधिक सुविधा मिलेगी।
सरकार का मानना है कि इन सुधारों से पेंशन फंड, बीमा कंपनियों और अन्य दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ेगी। इससे बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, शहरी विकास और अन्य राष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध होगी। RBI और सरकार दोनों को भरोसा है कि इन कदमों से विदेशी निवेश बढ़ेगा, वित्तीय बाजार मजबूत होंगे और भारत का भुगतान संतुलन पहले की तुलना में अधिक स्थिर बनेगा।


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