पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद ममता बनर्जी की सरकार बाहर हो गई। बीजेपी अब पहली बार राज्य में अपनी सरकार बनाने की तैयारी कर रही है। ममता बनर्जी ने छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी,लंबे संघर्ष के बाद तृणमूल कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया। उन्होंने खुद को एक जुझारू और ज़मीनी नेता के रूप में स्थापित किया। अब सवाल उठ रहा है कि विपक्ष में लौटने के बाद क्या वह अपने पुराने तेवर बरकरार रख पाएंगी। ममता बनर्जी ने 1984 में पहली बार राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी पहचान बनाई, जब उन्होंने अनुभवी वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को चुनाव में हराया। इस जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित बना दिया और लोग उन्हें ‘जायंट स्लेयर’ कहने लगे।
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हार के बाद ममता के अगले कदम पर नजर
2006 के सिंगूर आंदोलन और 2007 के नंदीग्राम आंदोलन ने ममता बनर्जी की राजनीति को नई ताकत दी। किसानों और स्थानीय लोगों के मुद्दों को उठाकर उन्होंने वाम मोर्चे के खिलाफ बड़ा जनसमर्थन हासिल किया। कलाकारों, बुद्धिजीवियों और समाज के कई वर्गों ने भी उनका समर्थन किया। इन आंदोलनों ने उन्हें राज्य की मुख्य विपक्षी आवाज बना दिया। आखिरकार 2011 में उन्होंने 34 साल पुराने वाम शासन को खत्म कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली। भ्रष्टाचार, भर्ती घोटालों और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उनकी सरकार की आलोचना हुई। कई मामलों में विपक्ष ने उन पर संवेदनशील मुद्दों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
समय के साथ उनके व्यवहार और राजनीति के अंदाज में बदलाव जरूर आया, लेकिन उन्होंने खुद को हमेशा एक मजबूत और लड़ाकू नेता के रूप में पेश किया। अब चुनावी हार के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष की राजनीति में खुद को फिर से मजबूत साबित करने की होगी। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ममता बनर्जी इतनी आसानी से सक्रिय राजनीति से दूर नहीं होंगी। उनका संघर्षशील स्वभाव उन्हें फिर से मैदान में उतार सकता है। विपक्ष में रहते हुए वह बीजेपी सरकार को लगातार चुनौती दे सकती हैं। हालांकि इस बार उन्हें अपनी पार्टी के भविष्य, संगठन की मजबूती और जनता का भरोसा दोबारा हासिल करने की कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। भवानीपुर सीट हारने के बाद उनकी राजनीतिक वापसी पर अब पूरे देश की नजर बनी हुई है।
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