सरकार ने 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के आधार पर महिला ओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान रखा था, लेकिन इसे लागू करने को जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया था। इसी कारण, कानून पास होने के बावजूद कई लोगों ने आशंका जताई कि इसका क्रियान्वयन काफी देर से होगा। अब नए प्रस्तावों के तहत यह संकेत मिल रहा है कि 2029 के आम चुनाव तक इस आरक्षण को लागू किया जा सकता है। हालांकि, विपक्ष ने इन कदमों के समय और मंशा पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दल इसे चुनावी रणनीति और महिला मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश बता रहे हैं।
सरकार ने लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा है, जिस पर सबसे अधिक विवाद हो रहा है। कई विपक्षी नेताओं ने कहा कि सीटों के पुनर्निर्धारण से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। उनका मानना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा करने से अधिक आबादी वाले राज्यों को फायदा मिलेगा। इससे संसद में क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। इस मुद्दे ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
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सीट बढ़ोतरी और महिला आरक्षण पर विवाद
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 के तहत लोकसभा की अधिकतम सीटें 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का नया विभाजन शामिल होगा। साथ ही, अनुच्छेद 81 में संशोधन कर 1971 की जनगणना पर आधारित सीटों की सीमा को हटाने की योजना है। सरकार परिसीमन प्रक्रिया को “ताज़ा प्रकाशित जनगणना” के आधार पर लागू करना चाहती है, जो फिलहाल 2011 की जनगणना है। यही आधार दक्षिणी राज्यों के लिए चिंता का कारण बन रहा है। उनका कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।
दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया है और इसे अनुचित बताया है। उनका तर्क है कि परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उनकी सीटें कम हो सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इससे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रभाव बढ़ेगा। कुछ नेताओं ने इसे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन के खिलाफ बताया। राज्य सरकारों से बिना परामर्श के इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक दलों में सिद्धांततः सहमति दिखती है, लेकिन इसके लागू करने के तरीके और समय पर मतभेद हैं। कई नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के मुद्दे का इस्तेमाल अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर रही है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पारदर्शिता की मांग करते हुए कहा कि सरकार को अपने रुख में बदलाव स्पष्ट करना चाहिए। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम चुनावों में महिला वोटरों को प्रभावित कर सकता है। कुल मिलाकर, इन प्रस्तावों ने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को और गहरा कर दिया है।
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