कीटनाशकों का संकट अब भारतीय कृषि के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। ईरान युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे कच्चे माल की उपलब्धता कम हो गई है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होने से रसायनों की सप्लाई पर सीधा असर पड़ा है। भारत, जो कीटनाशक उत्पादन में दुनिया में दूसरे स्थान पर है, इस संकट को तेजी से महसूस कर रहा है। कंपनियों की लागत बढ़ रही है और इसका असर किसानों तक पहुंचना तय है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो खरीफ सीजन प्रभावित हो सकता है।
कीटनाशकों का संकट का सबसे बड़ा कारण कच्चे माल की सप्लाई में आई रुकावट है। ईरान युद्ध के चलते हॉर्मुज मार्ग से गुजरने वाले केमिकल व्यापार पर असर पड़ा है। इससे नेफ्था जैसे जरूरी इनपुट की उपलब्धता कम हो गई है। नेफ्था की मदद से बनने वाले एथिलीन और प्रोपिलीन जैसे रसायन भी महंगे हो गए हैं। इसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ रहा है कंपनियां अब पहले से ज्यादा कीमत पर कच्चा माल खरीद रही हैं।
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खरीफ सीजन पर मंडराता खतरा और किसानों की चिंता
बढ़ता हुआ कीटनाशकों का संकट किसानों के लिए नई मुश्किलें पैदा कर रहा है। खरीफ सीजन में धान जैसी फसलों के लिए समय पर कीटनाशक नहीं मिले तो उत्पादन प्रभावित होगा। इससे फसल की गुणवत्ता भी गिर सकती है। किसानों को कीट नियंत्रण में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। इसका सीधा असर उनकी आय पर पड़ेगा। कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों ने खेती की लागत को और बढ़ा दिया है। किसान पहले ही खाद और ईंधन की कीमतों से परेशान हैं। कीटनाशकों का संकट के चलते बाजार में नकली उत्पादों का खतरा बढ़ रहा है।
जब असली कीटनाशकों की कमी होती है तो नकली उत्पाद तेजी से फैलते हैं। इससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। नकली दवाओं से फसल पूरी तरह खराब होने का खतरा रहता है। यह समस्या पहले भी सामने आ चुकी है। सरकार इस खतरे को देखते हुए सख्त कदम उठाने की तैयारी कर रही है। कृषि मंत्रालय नकली कीटनाशकों पर नियंत्रण के लिए नई रणनीति बना रहा है।
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