एक नई वैश्विक रिसर्च के अनुसार भारत के कई बड़े नदी डेल्टा क्षेत्र गंभीर भू-धंसाव की चपेट में हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र से लेकर महानदी, ब्राह्मणी और गोदावरी डेल्टा तक, जमीन के तेजी से धंसने की मुख्य वजह अत्यधिक भूजल निकासी बताई गई है, जो समुद्र के बढ़ते जल स्तर से भी ज्यादा तेज है।
एक नई वैश्विक स्टडी में सामने आया है कि भारत के कई प्रमुख नदी डेल्टा तेजी से धंस रहे हैं, और यह प्रक्रिया समुद्र स्तर में हो रही वृद्धि से भी अधिक तेज है। रिपोर्ट के मुताबिक गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, ब्राह्मणी और गोदावरी जैसे डेल्टा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अत्यधिक भूजल निकासी इसके पीछे प्रमुख वजह है, जिससे लाखों लोगों के लिए बाढ़ का जोखिम बढ़ता जा रहा है।
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सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र
पूर्वी और दक्षिणी भारत के तटीय हिस्सों में स्थित कई नदी डेल्टा इस संकट का सीधा सामना कर रहे हैं। घनी आबादी, उपजाऊ कृषि भूमि और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र इन क्षेत्रों में जोखिम को और बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने के साथ-साथ जमीन का तेजी से धंसना हालात को और गंभीर बना रहा है। दोनों प्रक्रियाएं मिलकर तटीय इलाकों में जलभराव और स्थायी बाढ़ की आशंका बढ़ा रही हैं।
लंबे समय से सिंचाई, उद्योग और शहरी जरूरतों के लिए लोग भारी मात्रा में भूजल निकाल रहे हैं। इससे जमीन के नीचे की परतें कमजोर हो रही हैं और भूमि लगातार नीचे बैठ रही है।
क्षेत्र पर बढ़ता डूबने का खतरा
इन डेल्टा क्षेत्रों में रहने वाली बड़ी आबादी अब ज्यादा बार बाढ़ का सामना कर रही है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि हालात नहीं बदले तो आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो सकता है।
पर्यावरण विशेषज्ञ सरकारों से भूजल प्रबंधन सख्त करने, वैकल्पिक जल स्रोत अपनाने और तटीय सुरक्षा योजनाओं पर तेजी से काम करने की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में नुकसान को रोका जा सके।
खेती और आजीविका पर असर
डेल्टा क्षेत्रों में किसान लगातार बढ़ती खारापन समस्या का सामना कर रहे हैं। समुद्री पानी खेतों में घुस रहा है, जिससे फसलें खराब हो रही हैं और पैदावार घट रही है। मछुआरों को भी बदलते जलस्तर और तटीय कटाव के कारण रोज़गार में अस्थिरता झेलनी पड़ रही है।
शहरी इलाकों में बढ़ता खतरा
इन डेल्टा क्षेत्रों में कई तेजी से बढ़ते शहर बसे हैं। जब जमीन धंसती है, तो सड़कें, इमारतें और ड्रेनेज सिस्टम कमजोर हो जाते हैं। इससे सामान्य बारिश भी जलभराव और शहरी बाढ़ का कारण बन रही है।
मैंग्रोव जंगल और आर्द्रभूमियां पहले तटीय इलाकों को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती थीं। मानवीय गतिविधियों ने इन पारिस्थितिक तंत्रों को नुकसान पहुंचाया है, जिससे डेल्टा अब तूफानों और ऊंची लहरों का सीधा सामना कर रहे हैं।
चेतावनी संकेत पहले से मौजूद
शोधकर्ता बताते हैं कि उपग्रह डेटा और जमीनी माप लंबे समय से जमीन के नीचे बैठने के संकेत दे रहे थे। कई क्षेत्रों में यह प्रक्रिया वर्षों से जारी है, लेकिन अब इसके असर साफ तौर पर दिखाई देने लगे हैं।
नीति और योजना की चुनौती
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकारों को विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय भू-धंसाव के जोखिम को प्राथमिकता देनी होगी। वे चेतावनी देते हैं कि बिना वैज्ञानिक आकलन के निर्माण और जल दोहन हालात को और बिगाड़ सकता है।
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