भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। ऐसे में देश के लोकतांत्रिक इतिहास से जुड़े उन दस्तावेजों को जानना बेहद खास हो जाता है, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की व्यवस्था को दिशा दी। ग्वालियर के महाराज बाड़ा स्थित संभागीय केंद्रीय पुस्तकालय में संविधान की एक दुर्लभ प्रति सुरक्षित रखी गई है। हाथ से लिखी गई इस पांडुलिपि को बेहद खूबसूरती से सजाया गया है। इसके पन्नों पर सोने की नक्काशी और आकर्षक डिजाइन दिखाई देते हैं। सबसे खास बात इसके अंतिम पृष्ठ से जुड़ी है, जहां संविधान सभा के 286 सदस्यों के वास्तविक हस्ताक्षर मौजूद बताए जाते हैं। इनमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव आंबेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख नेताओं के हस्ताक्षर भी शामिल हैं।
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आजादी के बाद ग्वालियर पहुंची संविधान की प्रति
संविधान की इस ऐतिहासिक प्रति का ग्वालियर पहुंचना भी अपने आप में दिलचस्प कहानी है। बताया जाता है कि संविधान की प्रतियों को अलग-अलग स्थानों पर सुरक्षित रखने की योजना बनाई गई थी, ताकि देश की जनता इस ऐतिहासिक दस्तावेज से जुड़ सके। इसी प्रक्रिया के तहत संविधान की एक प्रति ग्वालियर के केंद्रीय पुस्तकालय तक पहुंची। यह पुस्तकालय भी शहर के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सिंधिया राजवंश ने वर्ष 1927 में इसकी शुरुआत की थी। उस समय इसे मोती महल में ‘आलीजा बहादुर लाइब्रेरी’ के नाम से जाना जाता था। बाद में इसे महाराज बाड़ा स्थित भवन में स्थानांतरित किया गया और इसका नाम संभागीय केंद्रीय पुस्तकालय रखा गया। आज यह पुस्तकालय ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण के लिए भी जाना जाता है।
संविधान की यह पांडुलिपि केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय कला और इतिहास का भी अनोखा उदाहरण मानी जाती है। इसे सुंदर हस्तलिपि और विशेष कैलीग्राफी के जरिए तैयार किया गया। इसके पहले पन्ने को सोने से सजाया गया है, जबकि दूसरे पन्नों के बॉर्डर और सजावटी हिस्सों में भी सोने की पॉलिश और नक्काशी का इस्तेमाल किया गया है। पांडुलिपि के अलग-अलग हिस्सों में भारतीय इतिहास और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। इनमें मोहनजोदड़ो, वैदिक काल, महाभारत, भगवान बुद्ध और सम्राट अशोक से जुड़े चित्र, प्रतीक और ऐतिहासिक संदर्भ शामिल हैं। इन कलात्मक चित्रणों के जरिए संविधान को भारत की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक परंपराओं से जोड़ा गया है।
286 सदस्यों के हस्ताक्षर बनाते हैं इसे खास
इस संविधान प्रति की सबसे बड़ी विशेषताओं में संविधान सभा के सदस्यों के वास्तविक हस्ताक्षर शामिल हैं। अंतिम पृष्ठ पर मौजूद हस्ताक्षर उस दौर के उन नेताओं की याद दिलाते हैं, जिन्होंने देश के संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, जबकि जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी संविधान निर्माण की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। ऐसे में इन दिग्गजों के हस्ताक्षर इस दस्तावेज को ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। इसे देखने वाले छात्रों और युवाओं के लिए यह अनुभव देश के संविधान और स्वतंत्रता के इतिहास से सीधे जुड़ने जैसा है।
इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज की सुरक्षा के लिए पुस्तकालय में विशेष इंतजाम किए गए हैं। आम लोगों की पहुंच मूल प्रति तक सीमित रखी जाती है, ताकि लंबे समय तक इसे सुरक्षित रखा जा सके। इसके बजाय लोगों को संविधान की डिजिटल प्रति के जरिए इसके स्वरूप और ऐतिहासिक महत्व को देखने का अवसर दिया जाता है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और संविधान दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर इस दस्तावेज को देखने में लोगों की विशेष रुचि रहती है। छात्रों और युवाओं के लिए यह सिर्फ संविधान की जानकारी हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास और उसकी विरासत को करीब से समझने का अवसर भी है।
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