डेंटिस्ट की कमी ब्रिटेन में डॉक्टर्स जॉब छोड़ रहे हैं। इससे मरीज काफी परेशान हो रहे हैं। बीते एक साल में वहां 2000 से ज्यादा डेंटिस्ट ने नौकरी छोड़ दी है। इससे करीब 40 लाख मरीजों पर असर पड़ा है। एसोसिएशन ऑफ डेंटल ग्रुप्स ने नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) के आंकड़ों के हवाले से बताया है कि 2020 के अंत तक 23,733 डेंटिस्ट थे, जो 2021 के आखिर में घटकर 21,544 रह गए। यह पिछले 10 सालों में डेंटिस्ट की सबसे कम संख्या है।
फिलहाल हालत यह हो गई है कि देश के कई हिस्सों में डेंटिस्ट को दिखाने के लिए 3 साल बाद तक का अपॉइंटमेंट मिल रहा है। इसे लेकर लोगों में असंतोष भी बढ़ रहा है। बहुत से लोगों को दांतों की सर्जरी के लिए अपने शहर को छोड़कर दूसरे शहर में जाना पड़ रहा है। NHS के डेंटिस्ट नहीं मिलने से लोग निजी डॉक्टरों के पास जाने को मजबूर हो रहे हैं।
डेंटिस्ट की कमी : ये है वजह
डेंटिस्ट की इस कमी के लिए कोरोना महामारी, ब्रेक्जिट और सरकार की तरफ से NHS डेंटल को दिए जाने वाले कम बजट को जिम्मेदार माना जा रहा है। हालत यह है कि कुछ डेंटिस्ट NHS का पूरा बजट खत्म हो जाने के कारण मरीजों से ही अतिरिक्त फीस मांग रहे हैं।
ब्रिटिश डेंटल एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि NHS में डेंटल केयर कॉन्ट्रैक्ट के तहत पर्याप्त पैसा नहीं मिल रहा है। इससे आधी आबादी का दांत की बीमारियों का इलाज उपलब्ध हो पा रहा है। कॉन्ट्रैक्ट के तहत 12 साल में भी सुधार नहीं हो सका। इससे डेंटिस्ट NHS के साथ जुड़ना नहीं चाहते।
डेंटिस्ट की कमी : सरकारी अस्पतालों में मरीज खतरे में
ब्रिटेन में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सरकारी अस्पताल मरीजों का जीवन जोखिम में डाल रहे हैं। उन्होंने
NHS बैकलॉग की तरफ इशारा करते हुए कहा कि छतों से लीकेज, टूटी लिफ्टों और वार्डों में चूहों के होने
से खतरा बढ़
है। ऊपर से बार-बार बिजली गुल होने से लाइफ सेविंग वर्क जैसे एंबुलेंस सेवाएं भी
स्थगित कर दी गई हैं। इस कारण प्रसव के लिए महिलाओं को प्राइवेट
टैक्सियों के जरिए निजी अस्पतालों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
बता दें कि ब्रिटेन में महामारी के बाद से ही अस्पतालों की हालत खराब है। वहां मरीजों की सुरक्षा
खतरे में आने के केस 3 गुना हो चुके हैं।
कवायद: ईयू खर्च घटाने के लिए हटा रहा अनावश्यक मेडिकल टेस्ट
यूरोपीय यूनियन देशों में मरीज हर साल अनावश्यक मेडिकल टेस्ट कराने पर 11,400 करोड़ रुपए खर्च करते हैं। ईयू
स्वास्थ्य से जुड़े डेटा को मरीजों, मेडिकल एक्सपर्ट और रिसर्चर को बेहतर तरीके से उपलब्ध कराने के लिए अनावश्यक मेडिकल
टेस्ट में कटौती करना चाहता है।
इससे मरीजों के इन टेस्ट पर होने वाले खर्चे में भी कटौती हो सकेगी। इसके साथ ही 10 सालों
में इससे 80 हजार करोड़ रुपए की बचत होगी।


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