भारत ने 2028 में होने वाले COP33 जलवायु शिखर सम्मेलन की मेजबानी से पीछे हटने का अहम फैसला लिया है, जिसे कूटनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह कदम चौंकाने वाला इसलिए भी है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2023 में दुबई में आयोजित COP28 के दौरान भारत की मेजबानी की पेशकश की थी। इसके बाद BRICS देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिससे भारत की वैश्विक जलवायु नेतृत्व की मंशा साफ दिखी थी।
इसके अलावा, भारत ने इसकी तैयारियों के लिए एक विशेष सेल भी बनाई थी और शुरुआती स्तर पर योजनाएं भी शुरू कर दी थीं। हालांकि, समय के साथ वैश्विक हालात और घरेलू प्राथमिकताएं बदलने लगीं। इसलिए, 2 अप्रैल 2026 को भारत ने एशिया-पैसिफिक समूह को पत्र लिखकर अपनी दावेदारी वापस ले ली। इस तरह, यह फैसला न सिर्फ नीतिगत बदलाव को दर्शाता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जलवायु कूटनीति में भारत की नई रणनीति की ओर भी इशारा करता है।
प्रस्ताव से पीछे हटने की वजह
सबसे पहले, भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी है। देश का मानना है कि पेरिस समझौते का मौजूदा ढांचा विकासशील देशों के लिए पूरी तरह संतुलित नहीं है। खासकर, बड़ी आबादी वाले देशों के लिए तेज विकास और ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए, भारत अब “विकास-प्रथम” रणनीति पर जोर दे रहा है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विस्तार और नागरिकों की समृद्धि को प्रमुखता दी जा रही है।
इसके अलावा, भारत ने जलवायु लक्ष्यों के दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाए हैं। उदाहरण के लिए, 1.5 या 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य सभी देशों के लिए समान रूप से व्यावहारिक नहीं माने जा रहे। इसी कारण, भारत अब उत्सर्जन में कटौती से ज्यादा जलवायु अनुकूलन और दीर्घकालिक विकास संतुलन पर ध्यान दे रहा है। साथ ही, यह बदलाव भारत की नीतियों में एक स्पष्ट दिशा परिवर्तन को भी दर्शाता है, जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है।
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COP33 से पीछे हटने की वजह
दूसरी ओर, 2028 में होने वाला COP33 ‘ग्लोबल स्टॉकटेक’ के कारण बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसमें पेरिस समझौते के लक्ष्यों की प्रगति का आकलन किया जाएगा। ऐसे में मेजबान देश पर वैश्विक नेतृत्व दिखाने और उत्सर्जन कम करने के लिए ठोस कदम उठाने का दबाव काफी बढ़ जाता है। भारत, जो दुनिया के बड़े उत्सर्जकों में शामिल है, इस अतिरिक्त दबाव से बचना चाहता है ताकि वह अपनी विकास नीतियों में लचीलापन बनाए रख सके।
इसी के साथ, जलवायु वित्त, जीवाश्म ईंधन के उपयोग और IPCC की आगामी रिपोर्ट जैसे मुद्दों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद भी बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए, इन जटिल और विभाजित वैश्विक परिस्थितियों में सर्वसम्मति बनाना किसी भी मेजबान देश के लिए चुनौतीपूर्ण होता। यही कारण है कि भारत ने रणनीतिक रूप से पीछे हटना बेहतर समझा। अब इस फैसले के बाद एशिया-पैसिफिक समूह में किसी अन्य देश, खासकर दक्षिण कोरिया, के मेजबान बनने की संभावना और मजबूत हो गई है।
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