कभी प्रयागराज के सिविल लाइन्स में कॉफी पी है. या फिर दिल्ली, जयपुर और जबलपुर के सिविल लाइन्स की चौड़ी सड़कों पर घूमे हैं. चाहे शहर कोई भी हो, सिविल लाइन्स नाम सुनते ही दिमाग में अलग ही तस्वीर आ जाती है. बड़े-बड़े बंगले, पुराने घने पेड़, साफ-सुथरी सड़कें, लग्जरी लाइफ, पॉश इलाके और सरकारी रसूख की झलकियां दिखने लगती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर हर शहर के एक खास इलाके का नाम सिविल लाइन्स ही क्यों होता है और इसका मतलब क्या होता है. क्योंकि केंद्र सरकार अब इसे बदलने की तैयार में है. आइए, इस नाम के पीछे की पूरी कहानी जानते हैं.
क्यों बदला जा रहा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्ष्य रखा है कि 2047 तक भारत को ‘गुलामी की हर निशानी’ से मुक्त करना है. सरकार का मानना है कि ‘सिविल लाइन्स’ शब्द हमें उस दौर की याद दिलाता है, जब अंग्रेजों ने खुद को भारतीयों से अलग और खास दिखाने के लिए की थी. अब तक की बात करें, तो राजपथ अब कर्तव्य पथ बन चुका है. नौसेना के झंडे से अंग्रेजों वाला क्रॉस हटकर अब शिवाजी महाराज की शाही मुहर वाला निशान आ गया है और अब बारी इन इलाकों के नामों की है, जिन्हें भारतीय संस्कृति और महापुरुषों के नाम पर रखने की तैयारी है.
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सिविल लाइन्स का मतलब क्या होता है
ब्रिटिश राज के दौरान अंग्रेजों ने शहरों को तीन हिस्सों में बांटा था. कैंट (Cantonment) में सेना के जवान और अफसर रहते थे. ओल्ड सिटी यानी पुराना शहर में आम हिंदुस्तानी रहते थे, जैसे पुरानी दिल्ली या पुराने शहर की तंग गलियां और सिविल लाइन्स वह इलाका था जिसे अंग्रेजों ने अपने ‘सिविल’ अधिकारियों (जैसे कलेक्टर, जज और कमिश्नर) के रहने के लिए बनाया था. यहां सिविल प्रशासन के लोग रहते थे, इसलिए इसका नाम सिविल लाइन्स पड़ गया.
अंग्रेजों के जमाने में सिविल लाइन्स कैसा होता था
अंग्रेजों ने इन इलाकों को खास VIP लुक दिया था. यहां की सड़कें सीधी और चौड़ी होती थीं, बिल्कुल आज के पॉश इलाकों की तरह यहां का लोकेशन भी हुआ करता था. यहां रहने वाले अफसरों के पास बहुत बड़े बगीचे वाले बंगले होते थे, जिसमें हर तरह की सुविधाएं हुआ करती थीं. शहर के मुख्य चर्च, क्लब, कोर्ट और सर्किट हाउस इसी इलाके के आसपास बनाए जाते थे ताकि अंग्रेजों को अपनी लाइफस्टाइल से समझौता न करना पड़े.
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