बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के कल्याणपुर प्रखंड के मंगलापुर गांव की 103 वर्षीय हबीबन खातून को 32 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार अपनी ज़मीन का अधिकार मिल गया। जिला प्रशासन ने अदालत के आदेश के अनुसार पुलिस की मौजूदगी में उन्हें विवादित भूमि का कब्जा सौंपा। परिवार के लिए यह पल भावुक और राहत भरा रहा। हबीबन खातून अब बोलने और सुनने में असमर्थ हैं, लेकिन उनके बेटे रहमतुल्लाह ने बताया कि फैसले के बाद उनकी मां के चेहरे पर लंबे समय बाद संतोष दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने और न्याय का इंतजार करने के बाद आखिरकार परिवार को वह अधिकार मिला, जिसके लिए उन्होंने लगातार संघर्ष किया। इस फैसले की चर्चा पूरे इलाके में हो रही है और लोग इसे न्याय की जीत तथा धैर्य की मिसाल के रूप में देख रहे हैं।
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तीन दशक बाद खत्म हुआ ज़मीन विवाद
हबीबन खातून के बेटे रहमतुल्लाह ने बताया कि उनकी मां ने वर्षों पहले अपने गहने बेचकर यह ज़मीन खरीदी थी। परिवार के लिए यह केवल एक संपत्ति नहीं बल्कि उनकी मेहनत, बचत और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक थी। लगभग 1 कट्ठा 4 धुर यानी करीब 1,633 वर्ग फुट ज़मीन के अधिकार के लिए उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आर्थिक परेशानियों, बढ़ती उम्र और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बावजूद उन्होंने अपना दावा कायम रखा। परिवार ने भी हर सुनवाई में उनका साथ दिया और सभी जरूरी दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए। जब फैसला उनके पक्ष में आया तो पूरे परिवार ने राहत की सांस ली। रहमतुल्लाह ने कहा कि उनकी मां के लिए यह जीत किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है, क्योंकि उन्हें आखिरकार अपनी मेहनत से खरीदी गई ज़मीन वापस मिल गई।
इस ज़मीन विवाद की शुरुआत वर्ष 1993 में हुई थी। छह मार्च 1993 को हबीबन खातून के पति नईमुल्लाह अंसारी ने गांव के ही अफाक अख्तर से यह ज़मीन खरीदी थी। नईमुल्लाह अंसारी असम में फल बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते थे और अपनी मेहनत की कमाई से उन्होंने यह भूमि खरीदी थी। लेकिन खरीदारी के केवल दो दिन बाद, आठ मार्च 1993 को उनके चचेरे भाई लियाकत हुसैन ने भी उसी ज़मीन की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली। एक ही भूमि की दो अलग-अलग रजिस्ट्रियों ने कानूनी विवाद को जन्म दिया। मामला अदालत पहुंचा और वर्षों तक सुनवाई चलती रही। दस्तावेजों की जांच, गवाहों के बयान और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण फैसला आने में तीन दशक से अधिक समय लग गया।
हबीबन खातून के संघर्ष ने पेश की मिसाल
लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने हबीबन खातून के पक्ष में फैसला सुनाया और जिला प्रशासन को आदेश का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस की टीम ने गांव पहुंचकर पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत ज़मीन का सीमांकन कराया और हबीबन खातून को कब्जा दिलाया। प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए ताकि किसी तरह का विवाद या तनाव पैदा न हो। कार्रवाई शांतिपूर्ण तरीके से पूरी हुई और दोनों पक्षों के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखी गई। कब्जा मिलने के बाद परिवार के सदस्यों ने अदालत और प्रशासन का आभार जताया। गांव के कई लोगों ने भी इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि यह मामला दिखाता है कि कानून के रास्ते पर धैर्य के साथ चलने से अंततः न्याय मिल सकता है।
हबीबन खातून की कहानी आज संघर्ष, धैर्य और न्याय पर विश्वास की प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी है। 103 वर्ष की उम्र में 32 साल लंबी कानूनी लड़ाई जीतना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। उनका परिवार भी हर कठिन समय में उनके साथ खड़ा रहा और कानूनी प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाता रहा। इस मामले ने यह संदेश दिया है कि अधिकारों की रक्षा के लिए धैर्य और कानून पर भरोसा बनाए रखना जरूरी है। हालांकि न्याय मिलने में लंबा समय लगा, लेकिन अंत में उन्हें अपनी ज़मीन वापस मिल गई। उनकी यह जीत उन हजारों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो वर्षों से अपने अधिकारों के लिए अदालतों में संघर्ष कर रहे हैं और बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ न्याय की राह देख रहे हैं।
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