भारत ने अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर प्रतिक्रिया देते हुए इसका स्वागत किया, लेकिन पाकिस्तान की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि युद्धविराम क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है। भारत ने दोहराया कि इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए संवाद और कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि युद्ध ने पहले ही भारी तबाही मचाई है। साथ ही वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार पर इसके गंभीर प्रभाव पड़े हैं।
भारत ने उम्मीद जताई कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक और तेल जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य होगी। वहीं दूसरी ओर, कई देशों और नेताओं ने पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका की सराहना की। इसके बावजूद भारत ने इस्लामाबाद में संभावित बातचीत या पाकिस्तान के प्रयासों पर कोई टिप्पणी नहीं की। इस स्थिति ने भारत की कूटनीतिक रणनीति को लेकर सवाल खड़े किए। वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान को मिल रही मान्यता ने इस बहस को और तेज कर दिया।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि उन्होंने यह फैसला पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और सेना प्रमुख Asim Munir के अनुरोध पर लिया। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने भी पाकिस्तान के प्रयासों की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अन्य देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ ने भी पाकिस्तान सहित कई मध्यस्थ देशों के प्रयासों को सराहा। इससे पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता पर वैश्विक ध्यान गया।
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युद्धविराम में पाकिस्तान की भूमिका चर्चा में, भारत की स्थिति पर सवाल
भारत में विपक्षी दलों ने इस घटनाक्रम को लेकर सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि पाकिस्तान ने वह भूमिका निभाई जो भारत निभा सकता था। Jairam Ramesh और Rashid Alvi जैसे नेताओं ने सरकार की कूटनीति की आलोचना की। उनका मानना है कि इस घटनाक्रम से भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा है। हालांकि कुछ अन्य नेताओं ने इस आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि यह भारत का सीधा मुद्दा नहीं था। इस पर राजनीतिक मतभेद साफ़ तौर पर सामने आए।
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की भूमिका पारंपरिक मध्यस्थता से अलग रही है। विशेषज्ञ Harsh V. Pant के अनुसार, पाकिस्तान ने मुख्य रूप से संदेशों के आदान-प्रदान में भूमिका निभाई। उन्होंने इसे “शॉर्ट टर्म कूटनीति” बताया और कहा कि इसका अंतिम प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है। पूर्व विदेश सचिव Nirupama Menon Rao ने भी कहा कि पाकिस्तान ने एक संचार माध्यम के रूप में काम किया। हालांकि उन्होंने इस भूमिका के महत्व को पूरी तरह नकारा नहीं।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में संयमित कूटनीति अपनाई। भारत ने अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलन बनाए रखा, खासकर व्यापार और ऊर्जा हितों को ध्यान में रखते हुए। भारत ने अपने तेल आयात और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया। प्रधानमंत्री Narendra Modi और विदेश मंत्री S. Jaishankar ने कई देशों के नेताओं से बातचीत जारी रखी। इस रणनीति को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।
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