प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे आधिकारिक इसराइल दौरे पर पहुंचे हैं। इससे पहले वे 2017 में इसराइल गए थे, जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। 2018 में बिन्यामिन नेतन्याहू ने भारत आकर इस साझेदारी को आगे बढ़ाया था। इस बार मोदी इसराइली संसद के विशेष सत्र को संबोधित करेंगे। विपक्ष चाहता है कि सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष आइज़ैक अमीत को भी आमंत्रित किया जाए, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।
इस मुद्दे पर नेतन्याहू सरकार और सुप्रीम कोर्ट नेतृत्व के बीच टकराव जारी है। पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी नेता याएर लैपिड ने मोदी के संसदीय संबोधन के बहिष्कार की घोषणा की है। इसके बावजूद इसराइल का मीडिया इस दौरे को व्यापक कवरेज दे रहा है। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वेस्ट बैंक की स्थिति और ईरान को लेकर बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय हालात को संवेदनशील बना दिया है। कई विश्लेषक इसे केवल औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संदेश मान रहे हैं।
इसराइल के प्रमुख अख़बारों ने पहले पन्ने पर मोदी की तस्वीर के साथ दोनों देशों के रिश्तों को नए अध्याय की शुरुआत बताया है। विश्लेषणों में कहा गया है कि भारत और इसराइल के बीच राजनीतिक भरोसा और तकनीकी सहयोग गहरा हुआ है, लेकिन अब इसे बड़े स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है। मोदी के कार्यक्रम में संसद संबोधन, नवाचार मंच में भागीदारी और याद वाशेम में श्रद्धांजलि शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देश पारंपरिक सैन्य खतरों और वैचारिक हिंसा जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यही साझा सुरक्षा दृष्टिकोण संबंधों को और मजबूत बना रहा है।
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मोदी के दूसरे इसराइल दौरे में रक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर रहेगा फोकस
हिब्रू मीडिया में भी इस यात्रा को विशेष महत्व मिला है। भारत में इसराइल के राजदूत रेउवेन एज़र ने संकेत दिया कि दोनों देश संवेदनशील तकनीकों को साझा करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर को इस यात्रा का अहम उद्देश्य माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने में रुचि रखता है। दोनों देश तकनीकी क्षमता और रणनीतिक जरूरतों के आधार पर साझेदारी का दायरा विस्तृत करना चाहते हैं।
इस बार का दौरा 2017 से अलग आर्थिक और रक्षा दृष्टिकोण लेकर आया है। उस समय दोनों देशों ने कृषि, जल और उपग्रह परियोजनाओं में समझौते किए थे, जबकि अब अरबों डॉलर के रक्षा सौदों की संभावना जताई जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत वायु रक्षा प्रणाली, लेजर आधारित प्रणालियों और ड्रोन रोधी तकनीक में रुचि दिखा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि हालिया क्षेत्रीय तनाव और सीमाई चुनौतियों ने भारत को नई रक्षा तकनीक अपनाने की दिशा में प्रेरित किया है। इस प्रकार मोदी की यह यात्रा औपचारिक से अधिक रणनीतिक और भविष्य उन्मुख दिखाई दे रही है।
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