मध्य पूर्व के समुद्री इलाकों में इन दिनों एक अदृश्य तकनीकी खतरा जहाज़ों के लिए चिंता का कारण बन गया है। समुद्री एआई कंपनी की मरीन इंटेलिजेंस एनालिस्ट मिशेल वीज़ बॉकमैन जब ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर के पास चल रहे व्यापारिक जहाज़ों की लाइव लोकेशन देख रही थीं तो उन्हें नक्शे पर अजीब पैटर्न दिखाई दिए। सैकड़ों जहाज़ गोल-गोल क्लस्टर में एक ही जगह दिख रहे थे, जो सामान्य स्थिति में संभव नहीं होता। कुछ जहाज़ तो नक्शे पर जमीन के ऊपर दिखाई दे रहे थे। इससे साफ़ संकेत मिला कि जहाज़ों के जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी हो रही है।
दरअसल यह समस्या जीपीएस जैमिंग नाम की तकनीक से जुड़ी है। इसमें तेज़ रेडियो सिग्नल भेजकर असली जीपीएस सिग्नल को दबा दिया जाता है, जिससे जहाज़, ड्रोन या विमान अपनी सही लोकेशन नहीं दिखा पाते। युद्ध और सुरक्षा परिस्थितियों में इस तकनीक का इस्तेमाल दुश्मन को भ्रमित करने या किसी क्षेत्र की वास्तविक स्थिति छिपाने के लिए किया जाता है। हाल के वर्षों में यूरोप और यूक्रेन युद्ध के दौरान भी ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। अब मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के इस रूप का असर समुद्री मार्गों पर भी दिखने लगा है।
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मध्य पूर्व में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से नेविगेशन प्रभावित
होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे व्यस्त समुद्री रास्तों में यह स्थिति और खतरनाक बन जाती है। जहाज़ आम तौर पर ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) का उपयोग करके एक-दूसरे की स्थिति पहचानते हैं और टकराव से बचते हैं। लेकिन जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी होने से यह सिस्टम सही जानकारी नहीं दे पाता। सैकड़ों हजार टन तेल ले जाने वाले बड़े टैंकरों को दिशा बदलने या रुकने में लंबा समय लगता है। ऐसे में अगर आसपास के जहाज़ों की सही स्थिति पता न हो तो टकराने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति सामान्य तकनीकी खराबी से कहीं ज्यादा गंभीर है। कई सैन्य विश्लेषकों को शक है कि इस इलाके में हो रही जैमिंग के पीछे ईरान की भूमिका हो सकती है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि क्षेत्र में मौजूद अन्य सैन्य ताकतें भी अपने ठिकानों और जहाज़ों को ड्रोन या मिसाइलों से बचाने के लिए जैमिंग तकनीक का इस्तेमाल कर सकती हैं। इससे पूरे क्षेत्र में नेविगेशन सिस्टम पर असर पड़ रहा है।
टेक कंपनियों और विशेषज्ञों ने हाल के दिनों में सैटेलाइट डेटा और अन्य तकनीकों से इस जैमिंग की तीव्रता का अध्ययन किया है। कुछ विश्लेषकों ने राडार डेटा के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की कि जैमिंग डिवाइस कहां से काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि सिग्नल में होने वाली गड़बड़ी राडार डेटा में विशेष निशान छोड़ती है। इन संकेतों के आधार पर विशेषज्ञ पूरे इलाके में फैले जैमिंग नेटवर्क का अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
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