संयुक्त राष्ट्र महासचिव Antonio Guterres ने अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष पर चिंता जताई और सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील की। दोनों पक्ष अपने-अपने कदमों को सही ठहरा रहे हैं। लेकिन यह तय करने के लिए कि ईरान पर शुरुआती हमले वैध थे या नहीं, विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय कानून के नियमों की ओर देख रहे हैं। ये नियम द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए थे ताकि देशों के बीच युद्ध और सैन्य कार्रवाई को सीमित किया जा सके।
28 फरवरी को अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हवाई हमले शुरू किए। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने आरोप लगाया कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर रहा है, जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए खतरा बन सकते हैं। बाद में अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने कहा कि प्रशासन को पहले से पता था कि इसराइल कार्रवाई करने वाला है। उनका कहना था कि संभावित हमले को रोकने के लिए अमेरिका को पहले कदम उठाने पड़े।
ईरान ने इन हमलों के जवाब में इसराइल और मध्य-पूर्व के उन देशों पर मिसाइल हमले किए जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। ईरान ने इन कार्रवाइयों को आत्मरक्षा बताया। इस संघर्ष में हताहतों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ईरान में सैकड़ों लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं, जिनमें एक स्कूल पर हमले में मारी गई छात्राएं और स्टाफ भी शामिल बताए जाते हैं। वहीं लेबनान में हुए हमलों में भी कई लोगों की जान गई।
Read Also: सरफराज अहमद बन सकते हैं पाकिस्तान टेस्ट टीम के नए कोच
ईरान युद्ध की क़ानूनी वैधता पर बहस
कई अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इसराइल के शुरुआती हमलों को वैध ठहराने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार दिखाई नहीं देता। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार, कोई भी देश दूसरे देश के खिलाफ सैन्य बल का इस्तेमाल नहीं कर सकता, जब तक कि आत्मरक्षा की स्थिति स्पष्ट न हो। विशेषज्ञों का कहना है कि वैध आत्मरक्षा के लिए हमले के आसन्न खतरे का ठोस और स्पष्ट प्रमाण होना जरूरी है, जो अभी तक सामने नहीं आया।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख Rafael Grossi ने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम बड़ा और महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन परमाणु हथियार बनाने की संगठित योजना के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की जवाबी कार्रवाई, खासकर खाड़ी देशों पर किए गए अंधाधुंध हमले, भी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माने जा सकते हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि शक्तिशाली देश बार-बार अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करेंगे, तो वैश्विक व्यवस्था कमजोर हो सकती है। इससे भविष्य में अन्य देश भी इसी तर्क का इस्तेमाल करके सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने लगेंगे। उनका कहना है कि अगर ऐसी घटनाओं को स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी नहीं बताया गया, तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है और दुनिया “ताकतवर के कानून” की ओर बढ़ सकती है।
Read Also: अली ख़ामेनेई की मौत से मुस्लिम देशों पर क्या असर पड़ेगा?


More Stories
द केरल स्टोरी 2 ने ‘ओ रोमियो’, ‘मर्दानी 3’ को पछाड़ा; सक्सेस मार्क के करीब
Congress Slams Centre Over US 30-Day Russian Oil Waiver
Middle East Conflict May Impact India’s Basmati, Diamonds, Airlines: CRISIL