Operation Epic Fury के बाद ईरानी ने कम लागत वाले कामिकाज़े शाहेद ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया और जटिल एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में सफलता हासिल की। इन ड्रोन ने पश्चिम एशिया में भारी तबाही मचाई और आधुनिक युद्ध के आर्थिक समीकरण को बदल दिया। ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ मिलकर इन ड्रोन से रडार, सैन्य ठिकानों, तेल-गैस संरचनाओं, बंदरगाहों और हवाई अड्डों को निशाना बनाया। इस रणनीति ने दिखाया कि सस्ते लेकिन सटीक हथियार भी अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों को चुनौती दे सकते हैं। इससे युद्ध की प्रकृति और लागत दोनों में बड़ा बदलाव आया है।
पिछले कुछ समय में खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष ने यह स्पष्ट किया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और वायु शक्ति की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। Russia-Ukraine War के बाद से यह रणनीति वैश्विक स्तर पर अपनाई जा रही है। ईरान ने शाहेद-136, शाहेद-107 और शाहेद-238 जैसे ड्रोन का उपयोग कर दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बनाया। ये ड्रोन लॉयटरिंग म्यूनिशन के रूप में काम करते हैं, जो लक्ष्य क्षेत्र में मंडराकर सही समय पर हमला करते हैं। इस तकनीक ने युद्ध को अधिक लचीला और खतरनाक बना दिया है।
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ईरानी ड्रोन से बदले युद्ध समीकरण
ईरानी ड्रोन की सबसे बड़ी ताकत उनकी कम लागत और आसान निर्माण प्रक्रिया है। एक शाहेद ड्रोन की कीमत लगभग 20,000 से 50,000 डॉलर के बीच होती है, जबकि इन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों की लागत लाखों डॉलर तक पहुंचती है। Lockheed Martin द्वारा बनाए गए पैट्रियट सिस्टम जैसे हथियारों के इस्तेमाल में भारी खर्च आता है। इस लागत अंतर के कारण विरोधी देशों को आर्थिक दबाव झेलना पड़ रहा है। इसके अलावा, इंटरसेप्टर मिसाइलों की सप्लाई और उत्पादन में भी समय लगता है, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है।
ईरान ने ड्रोन झुंड रणनीति अपनाकर इस असंतुलन का पूरा फायदा उठाया है। कम लागत में बड़ी संख्या में ड्रोन भेजकर उसने महंगे एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर किया। इससे अमेरिका, इसराइल और उनके सहयोगियों को भारी आर्थिक और रणनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा। कई देशों को अपने इंटरसेप्टर भंडार बचाने के लिए वैकल्पिक उपाय अपनाने पड़े, जैसे लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल। हालांकि यह विकल्प भी महंगा साबित हुआ और युद्ध की लागत और बढ़ गई।
इस बदलते युद्ध परिदृश्य से भारत के लिए भी महत्वपूर्ण सबक सामने आते हैं। भारतीय सेना के पास हाई-टेक ड्रोन तो हैं, लेकिन कम लागत वाले कामिकाज़े ड्रोन की संख्या सीमित है। भारत को बड़े पैमाने पर ऐसे ड्रोन के निर्माण और खरीद पर ध्यान देना होगा। इसके साथ ही सस्ते काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित करना भी जरूरी है, ताकि महंगे एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भरता कम हो सके। यदि भारत समय रहते अपनी रणनीति में बदलाव करता है, तो वह भविष्य के जटिल युद्धों के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकता है।
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