March 7, 2026

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ईरान

ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से क्या बदल सकता है वैश्विक समीकरण?

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान के शासक अब तक की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। हालांकि, इस बार सरकार ने हालात से निपटने के लिए अलग रास्ता अपनाया है। पहले की तुलना में, अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कहीं सख्त कदम उठाए हैं। इसके अलावा, सरकार ने इंटरनेट सेवाओं को लगभग पूरी तरह बंद कर दिया है। नतीजतन, सूचनाओं का प्रवाह अचानक रुक गया है। इसी कारण, आम लोगों के लिए आपसी संपर्क भी मुश्किल हो गया है। अब तक, ईरान ने किसी भी संकट में ऐसा कदम नहीं उठाया था। इस बार, सुरक्षा व्यवस्था का स्तर पहले से कहीं अधिक कठोर दिखा। इसके साथ ही, सड़कों पर भारी संख्या में सुरक्षाबल तैनात किए गए। इसके परिणामस्वरूप, सार्वजनिक गतिविधियों में तेजी से कमी आई। धीरे-धीरे, विरोध की आवाजें कमजोर पड़ने लगीं। हालांकि, तनाव अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

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1979 के बाद सबसे बड़े संकट से जूझ रहा , सरकार ने अपनाया अभूतपूर्व सख़्त रुख

वहीं, जो सड़कें पहले विरोध से गूंजती थीं, अब अपेक्षाकृत शांत नजर आ रही हैं। समय के साथ, प्रदर्शनकारियों की संख्या भी कम होती दिखाई दी। इस बीच, तेहरान के एक निवासी ने मीडिया से अपनी बात साझा की। उसने बताया कि शुक्रवार को सड़कों पर भारी भीड़ जमा हुई थी। उसके अनुसार, हालात उस समय बेहद अराजक हो चुके थे। इसके अलावा, उसने व्यापक गोलीबारी की भी पुष्टि की। लेकिन इसके विपरीत, शनिवार रात तक माहौल बदल गया। उसने कहा कि शहर में अचानक शांति छा गई। इसी तरह, एक ईरानी पत्रकार ने भी स्थिति पर टिप्पणी की। उसने कहा कि अब बाहर निकलना जान जोखिम में डालने जैसा है। उसके अनुसार, डर लोगों के व्यवहार को नियंत्रित कर रहा है। इस कारण, लोग घरों में रहने को मजबूर हो रहे हैं। इसके साथ ही, सार्वजनिक विरोध लगभग गायब हो गया है।

प्रदर्शनों पर सख़्ती, इंटरनेट बंदी: ईरान में संकट से निपटने का नया तरीका

इस बार, आंतरिक अशांति के साथ एक बाहरी खतरा भी उभर आया है। इसी वजह से, सरकार दबाव में और सख्त हो गई है।
एक तरफ, देश के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय तनाव भी सरकार को चिंतित कर रहा है। इसलिए, सुरक्षा एजेंसियां हर मोर्चे पर सतर्क दिखाई दे रही हैं। इसके अलावा, सरकार किसी भी कमजोरी से बचना चाहती है। इसी क्रम में, अधिकारियों ने नियंत्रण की नीति अपनाई है। हालांकि, मानवाधिकार समूहों ने इन कदमों पर सवाल उठाए हैं। इसके बावजूद, सरकार विरोध को दबाने पर अड़ी हुई है। नतीजतन, जनता और शासन के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। इस स्थिति में, भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। फिर भी, फिलहाल सरकार शक्ति प्रदर्शन के जरिए स्थिरता दिखा रही है।

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