भारत और अमेरिका के बीच घोषित नई ट्रेड डील को लेकर राजनीतिक और आर्थिक हलकों में बहस तेज़ हो गई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को इस समझौते की घोषणा की। इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया था। अब सरकार ने इसे घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन विश्लेषक इसे अब भी ऊंचा मानते हैं।
कई विशेषज्ञ पुराने आंकड़ों का हवाला देकर इस डील पर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे पंकज पचौरी ने बताया कि 2004 तक भारत पर औसत अमेरिकी टैरिफ केवल 3.31 प्रतिशत था। 2014 तक यह और घटकर 2.93 प्रतिशत रह गया था। ऐसे में 18 प्रतिशत टैरिफ को उपलब्धि बताना भ्रामक लगता है। आलोचकों का कहना है कि भारत पुराने स्तरों से काफी पीछे चला गया है।
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भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर फायदे-नुकसान की बहस
ट्रंप प्रशासन इस डील को अमेरिका की जीत के रूप में पेश कर रहा है। व्हाइट हाउस का दावा है कि इससे अमेरिकी कारोबारियों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं को फायदा होगा। ट्रंप ने कहा कि भारत रूसी तेल आयात बंद करेगा और अमेरिकी उत्पादों पर शून्य टैरिफ लागू करेगा। इसके बदले भारत 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदेगा। हालांकि भारत सरकार ने इन सभी दावों की स्पष्ट पुष्टि नहीं की है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते से भारत के कुछ निर्यात क्षेत्रों को लाभ मिल सकता है। कपड़ा, चमड़ा, खिलौने और फर्नीचर जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों को अमेरिकी बाजार में बढ़त मिल सकती है। 18 प्रतिशत टैरिफ पाकिस्तान, वियतनाम और बांग्लादेश से कम है। इससे छोटे और मध्यम भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा में मदद मिल सकती है। फिर भी कई शर्तें अब तक अस्पष्ट बनी हुई हैं।
अमेरिकी मीडिया ने इस डील की व्यावहारिक चुनौतियों को भी रेखांकित किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग के अनुसार कृषि, डेयरी और जीएम फसलों पर भारत के सख्त नियम बड़ी बाधा बन सकते हैं। रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद करना भी भारत के लिए आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि डील के असली असर का आकलन तभी होगा जब सभी शर्तें साफ़ होंगी। फिलहाल यह समझौता फायदे और जोखिम, दोनों का मिश्रण दिखता है।
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