प्रधानमंत्री Narendra Modi बुधवार (25 फरवरी) को दो दिवसीय दौरे पर Israel रवाना हो रहे हैं। करीब आठ साल बाद हो रही इस यात्रा के दौरान वे अपने समकक्ष Benjamin Netanyahu और राष्ट्रपति Isaac Herzog से मुलाकात करेंगे। साथ ही इज़राइली संसद Knesset में उनके संबोधन की भी संभावना है। यह प्रधानमंत्री मोदी की दूसरी इज़राइल यात्रा होगी। इससे पहले जुलाई 2017 में उन्होंने ऐतिहासिक दौरा किया था, जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली इज़राइल यात्रा थी।
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भारत–इज़राइल संबंधों का सफर: विरोध से रणनीतिक साझेदारी तक
ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत और इज़राइल के रिश्तों का इतिहास क्या रहा है। आज भले ही दोनों देश करीबी रणनीतिक साझेदार हों, लेकिन शुरुआत में भारत ने इज़राइल के गठन का विरोध किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru और भारत की विदेश नीति उस समय फ़िलिस्तीन के समर्थन में थी। 1948 में इज़राइल के अस्तित्व में आने के बाद भी भारत ने लंबे समय तक औपचारिक दूरी बनाए रखी।
हालांकि, 1950 में भारत ने इज़राइल को मान्यता दे दी थी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। इसके पीछे शीत युद्ध की राजनीति, पश्चिम एशिया में भारत के रणनीतिक और ऊर्जा हित, तथा घरेलू राजनीतिक संतुलन जैसे कई कारण रहे। करीब 60 वर्षों तक कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री इज़राइल नहीं गया, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में औपचारिकता तो रही, लेकिन खुलापन नहीं दिखा।
1990 के दशक के बाद परिस्थितियां बदलीं। रक्षा, कृषि, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ने लगा। 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने संबंधों को नई ऊंचाई दी और उन्हें सार्वजनिक रूप से मजबूत रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिला। तब से लेकर अब तक रक्षा सौदों, नवाचार, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और स्टार्टअप सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के रिश्ते लगातार गहराते गए हैं।
आज भारत और इज़राइल के संबंध कूटनीतिक औपचारिकता से आगे बढ़कर बहुआयामी रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं, जो समय के साथ और मजबूत होती जा रही है।
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