भारत अमेरिका में अपने सामान पर 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगा रहा है, जबकि यूरोपीय संघ के 27 देशों में यह सिर्फ़ 15 प्रतिशत है। हाल ही में भारत और ईयू ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) की घोषणा की, जो अमेरिका को एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है। अमेरिका इससे असहज दिख रहा है और अमेरिकी वित्त मंत्री ने यूरोप के टैरिफ़ न लगाने की आलोचना की।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईयू एफ़टीए ट्रंप की टैरिफ़ नीति के असर को कमजोर करेगा और भारत की स्वतंत्रता बढ़ाएगा। भारत इस समझौते के जरिए अमेरिकी दबाव पर निर्भरता कम करना चाहता है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति मजबूत करता है। सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से यह समझौता चीन के केंद्रित व्यापार मॉडल के खिलाफ लोकतांत्रिक संतुलन भी स्थापित करता है।
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ईयू-भारत एफटीए: अमेरिका पर व्यापारिक दबाव कम करने और रणनीतिक स्वतंत्रता बढ़ाने की चाल
भारत ने पहले ही ओमान, न्यूज़ीलैंड और ब्रिटेन के साथ एफ़टीए कर अमेरिकी बाज़ार पर अपनी निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई है। इन समझौतों से भारत को फार्मा, टेक्सटाइल, रसायन और हाई-टेक मशीनरी के निर्यात में लाभ होगा।
ईयू एफ़टीए लागू होने के बाद भारत के निर्यात में वृद्धि और अमेरिकी टैरिफ़ का दबाव कम होने की उम्मीद है।
संयुक्त रूप से, भारत और यूरोप अमेरिका और चीन दोनों पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इस समझौते से भारत का यूरोपीय बाजार में 2031 तक निर्यात 50 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। भारत की रणनीति यह दिखाती है कि वह किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहेगा और वैश्विक विकल्प तलाश रहा है।
आगे ब्राज़ील, कनाडा और अन्य देशों के साथ भी भारत एफ़टीए बढ़ा रहा है, जिससे व्यापार और निवेश के नए अवसर खुलेंगे। इन साझेदारियों से ऊर्जा, कृषि और औद्योगिक उत्पादों के क्षेत्र में दीर्घकालिक लाभ मिलने की उम्मीद है। यह रणनीति ट्रंप के टैरिफ़ से हुए नुकसान को कम करने और वैश्विक स्वायत्तता को मज़बूत करने में मदद करेगी।
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