दिल्ली में ईस्ट इंडिया कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी सर थॉमस मेटकाफ़ होली खेलने के लिए जाने जाते थे। वह ब्रिटिश सामंती परिवार से आते थे और मुग़ल दरबार में कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते थे। इतनी ऊंची हैसियत के बावजूद उन्होंने स्थानीय परंपराओं में दिलचस्पी दिखाई। कहा जाता है कि वह होली के मौके पर लोगों के साथ रंगों का आनंद लेते थे। हालांकि उन्होंने अपने घर के अंदर रंग खेलने की अनुमति नहीं दी थी और हवेली में रखी नेपोलियन की मूर्तियों को रंगों से बचाने के लिए यह नियम बनाया गया था।
कई पुराने किस्सों के अनुसार, मेटकाफ़ ने दिल्ली के हिंदू समुदाय का विश्वास जीतने के लिए होली के उत्सव में भाग लिया। उन्होंने मुग़ल संस्कृति के प्रति अपने झुकाव और स्थानीय समाज के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश की। उनका सांस्कृतिक लगाव इतना गहरा था कि वह गर्मियों में भी मुहम्मद क़ुली ख़ां के मकबरे को परिवर्तित कर बनाए गए घर में समय बिताते थे। सर्दियों में वह मेटकाफ़ हाउस में रहते थे, जिसे स्थानीय लोग मटका कोठी के नाम से जानते थे। होली के दिन वह कुर्ता-पायजामा पहनकर उत्सव में शामिल होते थे।
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ब्रिटिश दौर में सर थॉमस मेटकाफ़ दिल्ली में हिंदुओं के साथ होली मनाते थे।
1857 के विद्रोह के बाद मेटकाफ़ हाउस का माहौल पूरी तरह बदल गया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान खानाबदोश गुर्जरों ने इस इमारत को लूटकर काफी नुकसान पहुंचाया। उनका मानना था कि यह मकान उनके पूर्वजों की जमीन पर बनाया गया था और जमीन उनसे कम कीमत पर ले ली गई थी। उस समय तक सर थॉमस मेटकाफ़ का निधन हो चुका था और कुछ कथाओं में दावा किया जाता है कि उन्हें मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की पत्नी ज़ीनत महल ने ज़हर दिया था, हालांकि इस दावे की ऐतिहासिक पुष्टि स्पष्ट नहीं है।
सर थॉमस के बाद ब्रिटिश रेज़िडेंट बने सर थियोफिलस मेटकाफ़ को 1857 के विद्रोह के दौरान गंभीर अपमान झेलना पड़ा। विद्रोही सैनिकों ने उन्हें अधनंगा कर दिल्ली की सड़कों पर दौड़ाया। बाद में पहाड़गंज के एक थानेदार ने दया दिखाकर उन्हें घोड़ा दिया, जिसकी मदद से वह राजपूताना भाग गए। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के लोगों के प्रति कठोर रवैया अपनाया। इसके विपरीत, सर थॉमस होली खेलने के बाद अपने कपड़े उतारकर हिंदू नौकरों को दान कर देते थे, जिन्हें नौकर पूरे गर्मियों में पहनते थे।
दिल्ली के मेटकाफ़ हाउस की तरह आगरा के हैलिंगर हॉल में भी अंग्रेज़ अधिकारी होली और दीवाली जैसे त्योहार मनाते थे। यह भवन सर चार्ल्स मेटकाफ़ की हवेली की तर्ज़ पर बनाया गया था। उस दौर में कई अंग्रेज़ अधिकारी यहां कॉकटेल, नृत्य और सामाजिक आयोजनों में शामिल होने आते थे। इन समारोहों में स्थानीय व्यापारी और सेठ-साहूकार भी भाग लेते थे। हालांकि समय के साथ कई इमारतें नष्ट हो गईं, लेकिन हैलिंगर हॉल के खंडहर आज भी उस दौर की कहानी बयान करते हैं।
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