अंजना के पिता स्वर्गीय बिपिन चंद्र भट्ट भारतीय सेना में मेजर थे और उन्होंने यह मकान बनवाया था।
वर्ष 1994 में पिता के निधन के बाद बेटे और बेटी की असमय मौत से अंजना अकेली रह गईं।
लगातार पारिवारिक सदमों के कारण अंजना सिजोफ्रेनिया जैसी गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रस्त हो गईं।
साल 2016 में इलाज के लिए उन्हें रिहैब सेंटर में भर्ती कराया गया।
इसी दौरान आरोपियों ने उनकी बीमारी और अकेलेपन का फायदा उठाकर फर्जी दस्तावेज बनाए।
फर्जी कागजों के जरिए मकान पर कब्जा किया गया और किसी अन्य के नाम का बोर्ड लगा दिया गया।
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थाने से लेकर दफ्तरों तक की गई कोशिशें
रिहैब सेंटर के डॉक्टर के अनुसार, अंजना ने पहले स्थानीय थाने में शिकायत दी, लेकिन कार्रवाई में देरी हुई। हालात की गंभीरता को समझते हुए 31 दिसंबर की शाम वे मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचीं और अपनी आपबीती बताई। मुख्यमंत्री कार्यालय से निर्देश मिलने के बाद पुलिस और प्रशासन हरकत में आया। दस्तावेजों की जांच में फर्जीवाड़ा सामने आया और गुरुवार सुबह तक मकान अंजना को वापस सौंप दिया गया।
पुलिस की मौजूदगी में ताले खुलवाए गए। घर में कदम रखते ही अंजना भावुक हो गईं और एक-एक कमरे को देखती रहीं, जो उनके संघर्ष और न्याय की कहानी बयां कर रहा था।
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