भारत में लंबे समय से यह माना जाता रहा कि नेपाल में कम्युनिस्ट दलों की मज़बूती दोनों देशों के रिश्तों के लिए चुनौती बन सकती है। हालांकि पिछले साल उभरे जेन ज़ी आंदोलन ने नेपाल की पारंपरिक राजनीति को बड़ा झटका दिया। इसी बदले माहौल में Balen Shah और उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने तेज़ी से लोकप्रियता हासिल की। मार्च 2026 के चुनाव में पार्टी ने भारी बहुमत जीतकर पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई। इसके बाद 26 मार्च को बालेन शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। भारत में कई लोगों को उम्मीद थी कि बालेन शाह के नेतृत्व में भारत-नेपाल संबंध और मजबूत होंगे।
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भारत को लेकर बालेन शाह का नया रुख चर्चा में
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने चुनाव जीतने के बाद शाह को बधाई देते हुए भारत आने का निमंत्रण भी दिया। लेकिन शाह ने भारत को लेकर किसी विशेष उत्साह का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने विदेशी राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात करने की पुरानी परंपरा समाप्त कर दी और सभी दूतों को एक साथ मिलने का समय दिया। इस फैसले के बाद भारत के राजदूत को मिलने वाले विशेष महत्व पर भी रोक लग गई। नेपाल की नई सरकार ने यह भी साफ कर दिया कि प्रधानमंत्री बालेन शाह कम से कम एक साल तक कोई विदेश यात्रा नहीं करेंगे। रिपोर्ट्स के मुताबिक शाह ने भारतीय विदेश सचिव Vikram Misri से मिलने में भी रुचि नहीं दिखाई। उनका मानना था कि वे मंत्री स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों से मुलाकात नहीं करेंगे।
इस रुख़ ने नेपाल और भारत के राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू कर दी। कई विशेषज्ञों का मानना है कि शाह खुद को एक मजबूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत रहे Ranjit Rae का कहना है कि बालेन शाह जनता के बीच राष्ट्रवादी छवि बनाकर अपनी लोकप्रियता मजबूत करना चाहते हैं। उनके अनुसार शाह ने काठमांडू के मेयर रहते हुए भी इसी तरह की राजनीति की थी। वहीं नेपाल के पूर्व राजदूत Deep Kumar Upadhyay ने शाह के फैसलों का समर्थन किया। उनका मानना है कि भारत और नेपाल के रिश्तों को स्पष्ट राजनयिक प्रोटोकॉल के तहत चलना चाहिए और पुराने अनौपचारिक तरीकों को बदलने की जरूरत थी।
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बालेन शाह का बदला रुख
नेपाल के प्रमुख अखबारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने भी शाह की नीतियों पर अलग-अलग राय दी है। कुछ लोगों का कहना है कि विदेशी राजदूतों की शीर्ष नेताओं तक आसान पहुंच नेपाल के राष्ट्रीय हितों के लिए सही नहीं थी। वहीं आलोचकों का मानना है कि शाह का व्यवहार जरूरत से ज्यादा कठोर और असहयोगी दिखाई दे रहा है। संसद के औपचारिक कार्यक्रमों में उनका रवैया भी सवालों के घेरे में आया है। कई वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने उन्हें संस्थाओं और संसदीय परंपराओं के प्रति अधिक जिम्मेदार रवैया अपनाने की सलाह दी है।
आरएसपी की ऐतिहासिक जीत ने नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव जरूर किया है, लेकिन बालेन शाह की विदेश नीति को लेकर अब भी कई सवाल बने हुए हैं। पार्टी के भीतर भी कुछ नेता उनके फैसलों से पूरी तरह सहमत नहीं बताए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रवाद के सहारे लोकप्रियता हासिल करना आसान है, लेकिन पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि शाह की रणनीति नेपाल को नई दिशा देती है या क्षेत्रीय संबंधों में और तनाव पैदा करती है।
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