कर्नाटक सरकार ने मैसूर दशहरा उत्सव के उद्घाटन के लिए लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता बानू मुश्ताक को मुख्य अतिथि आमंत्रित किया। इस फैसले के खिलाफ SC सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि यह हिंदू धार्मिक परंपराओं का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि चामुंडेश्वरी मंदिर में होने वाले वैदिक अनुष्ठानों में गैर-हिंदू को शामिल करना उचित नहीं है। 19 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सरकार के फैसले में कोई संवैधानिक या कानूनी त्रुटि नहीं है। इसका अर्थ यह है कि बानू मुश्ताक ही इस वर्ष के दशहरा समारोह की मुख्य अतिथि होंगी।
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दशहरा: बानू मुश्ताक को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि मैसूर दशहरा, विशेष रूप से चामुंडेश्वरी मंदिर में होने वाला उद्घाटन, पूरी तरह से वैदिक परंपराओं पर आधारित होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस धार्मिक आयोजन में किसी गैर-हिंदू को शामिल करना आगमिक परंपराओं और धार्मिक भावनाओं के खिलाफ है। कुछ ने बानू मुश्ताक के पुराने बयानों को ‘हिंदू विरोधी’ और ‘कन्नड़ विरोधी’ बताते हुए विरोध जताया। पूर्व सांसद प्रताप सिम्हा सहित कई भाजपा नेताओं ने इस फैसले को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी और कहा कि यह परंपराओं का अपमान है।
कर्नाटक सरकार ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि मैसूर दशहरा कोई निजी धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि राज्य का सांस्कृतिक उत्सव है। सरकार ने स्पष्ट किया कि पूजा और वैदिक अनुष्ठान मंदिर के पुजारियों द्वारा ही किए जाएंगे, जबकि मुख्य अतिथि की भूमिका प्रतीकात्मक और सामाजिक सम्मान की है। बानू मुश्ताक एक सम्मानित लेखिका, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्हें पहले भी कई सार्वजनिक मंचों पर आमंत्रित किया जा चुका है। सरकार ने कहा कि संविधान के तहत किसी भी नागरिक को ऐसे आयोजनों में शामिल होने से नहीं रोका जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने धार्मिक परंपराओं के उल्लंघन का आरोप लगाया
इससे पहले कर्नाटक हाई कोर्ट ने 15 सितंबर को इस मामले में दायर चार जनहित याचिकाएं खारिज कर दी थीं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी संवैधानिक या कानूनी उल्लंघन को साबित नहीं कर पाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अन्य धर्म के व्यक्ति की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति न तो पूजा विधि को प्रभावित करती है और न ही संविधान का उल्लंघन करती है। इसके बाद याचिकाकर्ता एच.एस. गौरव ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया।
यह विवाद सिर्फ धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे राज्य में राजनीतिक गर्मी भी बढ़ गई है। एक तरफ सरकार इस फैसले को समावेशी और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के अनुरूप बता रही है, तो दूसरी ओर विरोधी इसे धार्मिक भावनाओं का अपमान मान रहे हैं। मैसूर दशहरा, जिसे ‘नाडा हब्बा’ कहा जाता है, 22 सितंबर से शुरू होकर 2 अक्टूबर तक चलेगा। यह आयोजन देवी चामुंडेश्वरी की पूजा के साथ शुरू होता है और राजपरिवार की परंपराओं से जुड़ा है। अब यह विवाद समावेशिता बनाम परंपरा की राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है।


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