ठाकरे परिवार के दोनों भाई आगामी बीएमसी चुनाव को ध्यान में रखते हुए सीटों के समीकरण को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, ताकि चुनावी मैदान में पूरी एकजुटता के साथ उतर सकें। सूत्रों के मुताबिक, बीएमसी की कुल 227 सीटों में से उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को लगभग 145 से 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर मिल सकता है। महाराष्ट्र की राजनीति में बुधवार को जो घटनाक्रम देखने को मिला, वह मानो 20 साल पुराने राजनीतिक चक्र के पूरा होने जैसा है। नवंबर 2005 में शिवसेना छोड़ने वाले राज ठाकरे अब ठीक दो दशक बाद अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे के साथ राजनीतिक गठबंधन में लौट आए हैं। बीएमसी चुनाव को लेकर मनसे और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के बीच औपचारिक तालमेल बन चुका है।
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बीएमसी चुनाव को लेकर उद्धव–राज में सीट शेयरिंग पर सहमति
इस राजनीतिक समीकरण की शुरुआत शिवाजी पार्क स्थित बालासाहेब ठाकरे के स्मारक पर दोनों भाइयों द्वारा परिवार सहित श्रद्धांजलि अर्पित करने से हुई। इसके बाद दोनों ने महाराष्ट्र के हित में पुराने मतभेद भुलाकर साथ आने की बात कही। हालांकि इस तस्वीर के पीछे महाराष्ट्र की राजनीति में काफी कुछ घट चुका है। शिवसेना अब दो हिस्सों में बंट चुकी है, जिसमें बड़ा गुट एकनाथ शिंदे के साथ है, जो वर्तमान में राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं। दूसरी ओर, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना हाल के कई चुनावों में लगातार शून्य पर सिमटती रही है। ऐसे हालात में राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव बनाए रखने के लिए दोनों भाइयों का साथ आना लगभग अनिवार्य हो गया था। चूंकि दोनों की राजनीति मराठी अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही है, इसलिए वैचारिक स्तर पर भी उनके बीच कोई बड़ी बाधा नहीं दिखती।
सीट बंटवारे के तहत मनसे को 65 से 70 सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है, जबकि शरद पवार की एनसीपी को 10 से 12 सीटें दिए जाने की चर्चा है। राज ठाकरे ने स्पष्ट किया है कि उनके लिए सीटों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण महाराष्ट्र के हित हैं। उन्होंने कहा कि मुंबई का मेयर मराठी होना चाहिए और यही उनका मुख्य उद्देश्य है।
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20 साल बाद ठाकरे भाइयों का राजनीतिक मिलन, मराठी अस्मिता बनी साझा ज़मीन
वहीं एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के नेता राजू वाघमरे ने इस गठबंधन पर सवाल उठाते हुए कहा कि दोनों भाइयों ने बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा से समझौता किया है, जिसे उनकी आत्मा कभी स्वीकार नहीं करेगी। मनसे के चुनावी प्रदर्शन की बात करें तो पार्टी को सबसे बड़ी सफलता 2009 के विधानसभा चुनाव में मिली थी, जब उसने 13 सीटें जीती थीं। इसके बाद 2014 और 2019 में पार्टी सिर्फ एक-एक सीट पर सिमट गई, जबकि 2024 में उसका खाता भी नहीं खुल सका। ऐसे में राज ठाकरे के लिए गठबंधन की जरूरत और भी बढ़ गई थी। वहीं उद्धव ठाकरे को भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद एक मज़बूत सहयोगी की तलाश थी।
दोनों भाइयों की इस राजनीतिक एकता पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि यह गठबंधन अस्तित्व बचाने की कोशिश है और दोनों नेता अवसरवादी राजनीति कर रहे हैं। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने भी इसी तर्ज पर टिप्पणी करते हुए इसे पारिवारिक स्वार्थ से प्रेरित करार दिया।
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