सुप्रीम कोर्ट की रोक: क्यों अहम मानी जा रही है
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के 2026 के भेदभाव-रोधी नियमों पर अंतरिम रोक लगाई और कहा कि नियमों के कुछ प्रावधान अस्पष्ट हैं तथा इनके दुरुपयोग की आशंका बनी हुई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि इन सवालों को नज़रअंदाज़ किया गया तो इसके दूरगामी सामाजिक प्रभाव पड़ सकते हैं और समाज में विभाजन बढ़ सकता है। इसी आधार पर कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया और मामले को तीन जजों की बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। यह आदेश ऐसे समय में आया, जब देश के कई हिस्सों में इन नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहे थे।
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शिक्षा जगत और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया
इस फैसले ने शिक्षा जगत और सामाजिक न्याय से जुड़े लोगों को निराश किया है। रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों की पृष्ठभूमि में बने इन नियमों को कई लोग उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव के खिलाफ एक ज़रूरी सुरक्षा कवच मानते हैं। आलोचकों का तर्क है कि केवल दुरुपयोग की आशंका के आधार पर नियमों पर रोक लगाना गलत संदेश देता है, क्योंकि हर कानून के साथ ऐसी संभावना रहती है। समाजशास्त्रियों और दलित नेताओं का कहना है कि इस रोक से यह स्वीकारोक्ति कमजोर पड़ती है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव एक वास्तविक और लगातार बनी रहने वाली समस्या है, जिससे निपटने के लिए मजबूत नियमन की आवश्यकता है।
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