पश्चिम एशिया में जारी युद्ध अब केवल सैन्य ठिकानों, ड्रोन हमलों और तेल प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहा। अब संघर्ष ने पीने के पानी से जुड़े महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भी अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। हाल ही में ईरान से जुड़े हमले में कुवैत के एक डीसैलिनेशन (समुद्री जल शुद्धिकरण) प्लांट को निशाना बनाए जाने के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे हमले बढ़ते हैं तो करोड़ों लोगों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि खाड़ी देशों की पेयजल व्यवस्था बड़े पैमाने पर इन्हीं संयंत्रों पर निर्भर करती है।
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खाड़ी देशों की जीवनरेखा बने डीसैलिनेशन प्लांट
खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे शुष्क इलाकों में शामिल है, जहां नदियां कम हैं, वर्षा बेहद सीमित होती है और भूजल संसाधन भी पर्याप्त नहीं हैं। यही कारण है कि इन देशों ने समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर डीसैलिनेशन प्लांट स्थापित किए हैं। यही संयंत्र घरों, अस्पतालों, उद्योगों, होटलों और व्यावसायिक क्षेत्रों तक पीने का पानी पहुंचाते हैं। बहरीन, कुवैत और कतर जैसे देश अपनी पेयजल जरूरतों का लगभग पूरा हिस्सा इन्हीं प्लांटों से पूरा करते हैं, जबकि सऊदी अरब, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात भी बड़े स्तर पर इन पर निर्भर हैं।
हाल के महीनों में ईरान, कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के कई डीसैलिनेशन प्लांट हमलों या ड्रोन गतिविधियों की चपेट में आए हैं। मार्च से जुलाई 2026 के बीच कुवैत के दोहा वेस्ट और शुआइबा कॉम्प्लेक्स, बहरीन के प्रमुख जल संयंत्र तथा यूएई के फुजैराह और जेबेल अली प्लांट के आसपास सुरक्षा खतरे सामने आए। कई मामलों में बिजली उत्पादन इकाइयों और जल आपूर्ति ढांचे को नुकसान पहुंचा, हालांकि अधिकांश देशों ने आपातकालीन योजनाओं के जरिए पेयजल आपूर्ति बनाए रखी। इन घटनाओं ने क्षेत्र के जल सुरक्षा तंत्र को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
जल के ढांचे पर हमले क्यों हैं सबसे बड़ा खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार, खाड़ी देशों में 90 प्रतिशत से अधिक पेयजल डीसैलिनेशन प्लांटों से प्राप्त होता है। यदि इन संयंत्रों पर बड़े स्तर पर हमले होते हैं या वे लंबे समय तक बंद रहते हैं, तो करोड़ों लोगों के सामने पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। अस्पतालों, उद्योगों, बिजली संयंत्रों और आवश्यक सेवाओं पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। पानी की कमी सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता को बढ़ा सकती है तथा मानवीय संकट की स्थिति पैदा कर सकती है।
अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने भी अपनी एक रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख डीसैलिनेशन प्लांट लंबे समय तक बंद होने पर कई देशों में राष्ट्रीय आपातकाल जैसे हालात बन सकते हैं। मौजूदा युद्ध के बीच इन संयंत्रों पर बढ़ते खतरे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है। यदि पश्चिम एशिया का युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका असर पूरी दुनिया में खाद्य, ऊर्जा और पानी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
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