साउथ कोरिया में मासूम बच्चों के माता-पिता होते हुए भी उन्हें अनाथ घोषित किया गया. ताकि उन्हें अमेरिका और यूरोप के देशों में गोद लेने के लिए भेजा जा सके. यदि प्रस्थान से पहले किसी बच्चे की मृत्यु हो जाती, तो उसके स्थान पर किसी अन्य बच्चे को भेज दिया जाता. यह सब द. कोरिया की पूर्व सरकारों द्वारा किया गया. अब, देश की वर्तमान सरकार ने इस अपराध को स्वीकार किया है. आधिकारिक जांच में पाया गया कि सरकार ने दस्तावेज़ों और रिकॉर्ड्स में हेरफेर किया. परिजनों की बिना सहमति के स्थानीय बच्चों को विदेश भेजा ताकि उन्हें गोद लिया जा सके. अब सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से माफी की सिफारिश की गई है.
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दक्षिण कोरिया के ट्रुथ एंड रिकॉन्सिलिएशन कमीशन ने एक बयान में कहा, “यह पाया गया है कि सरकार ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया. इसके परिणामस्वरूप, कई बच्चों को विदेश भेजने की प्रक्रिया के दौरान, उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ. ये अधिकार संविधान और अंतरराष्ट्रीय समझौतों द्वारा संरक्षित हैं.”
दक्षिण कोरिया एशिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और एक सांस्कृतिक महाशक्ति है. फिर भी, यह दुनिया में बच्चों के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक है. 1955 से 1999 के बीच, दक्षिण कोरिया ने 1,40,000 से अधिक बच्चों को विदेशों में गोद लेने के लिए भेजा.
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दक्षिण कोरियाई युद्ध के बाद, अमेरिकी सैनिकों और स्थानीय महिलाओं के मिश्रित नस्ल के बच्चों के लिए एक योजना बनाई गई: अंतरराष्ट्रीय गोद लेना. आप पूछ सकते हैं, कोई देश मिश्रित नस्ल के बच्चों को क्यों हटाएगा? दरअसल, दक्षिण कोरिया जातीय एकरूपता पर जोर देता है.
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साउथ कोरिया में अंतरराष्ट्रीय गोद लेने पर मानवाधिकार उल्लंघन का खुलासा
देश के ट्रुथ एंड रिकॉन्सिलिएशन कमीशन ने दो साल और सात महीने तक जांच की. इसके बाद, एक ऐतिहासिक घोषणा में कहा कि दक्षिण कोरिया के बच्चों के अंतरराष्ट्रीय गोद लेने में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ. जो बच्चे अनाथ नहीं थे, उन्हें भी अनाथ बताया गया. उनकी पहचान से छेड़छाड़ की गई. यहां तक कि गोद लेने वाले माता-पिता की पर्याप्त जांच भी नहीं की गई. कई मामलों में, बच्चों के कोरियाई जन्म माता-पिता से कानूनी रूप से उचित सहमति नहीं ली गई.
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कमीशन ने यह भी कहा कि दक्षिण कोरियाई सरकार गोद लेने की फीस को रेगुलेट करने में विफल रही. एजेंसियां आपस में ही समझौता करने मनमर्जी तरीके से फीस लेती रहीं. इस तरह गोद लेने जैसा पवित्र माने जाने वाला काम फायदा कमाने वाली इंडस्ट्री में बदल गया.
कमीशन की आयोग की अध्यक्ष पार्क सन-यंग ने कहा, “ये उल्लंघन कभी नहीं होने चाहिए थे. यह साउथ कोरिया के इतिहास का शर्मनाक हिस्सा है.”
एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार सालों से गोद लिए गए कोरियाई लोगों (जिन्हें बचपन में गोद लेने के लिए विदेश भेज दिया गया) ने अपने अधिकारों की वकालत की है. कई लोगों ने बताया है कि उनकी जन्म देने वाली माताओं को अपने बच्चों को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था. इस तरह बच्चों को कानूनी रूप से गोद लेने योग्य बनाने के लिए रिकॉर्ड तैयार किए गए.
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